वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में भूमि संघर्ष छिड़ गए, जिसे दबाने के लिए संयुक्त मोर्चा सरकार ने सशस्त्र कार्रवाई की। नक्सलबाड़ी में शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस ने गोलियां चलाकार 11 गरीब-भूमिहीन महिला-पुरुष-बच्चों की हत्या कर दी। 25 मई, 1967 की इस घटना के बाद सीपीआई एम विभाजित हो गई।
1969 में बनी भाकपा माले
सीपीआई (एम) से अलग होकर कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने 22 अप्रैल, 1969 को लेनिन के जन्म दिवस पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की स्थापना की। चारु मजूमदार पार्टी के पहले महासचिव बने थे।
वर्ष 1974 में हुआ पुनर्गठन
मजूमदार की हत्या के बाद पार्टी में बिखराव आ गया था। बिखराव, भ्रम व नेतृत्वहीनता के उस माहौल में वर्ष 1974 में जौहर (सुब्रत दत्त) के नेतृत्व में भाकपा माले का पुनर्गठन किया गया था। तीन सदस्यीय केंद्रीय कमेटी का गठन हुआ, जिसमें जौहर के अलावा विनोद मिश्र व स्वदेश भट्टाचार्य शामिल थे।
इन सबसे मुश्किल दौरों में भी पार्टी ने खुद को कदम-ब-कदम पुनर्गठित किया और बिहार के भोजपुर में नक्सलबाड़ी की मशाल को जलाए रखा। जौहर की वर्ष 1975 में भोजपुर के बाबूबांध में पुलिस की गोली लगने से मौत हो गई। इसके बाद विनोद मिश्र पार्टी के तीसरे महासचिव बनाए गए। इसके बाद पार्टी ने बिहार में किसान आंदोलन समेत कई अन्य आंदोलन चलाए।
पहली बार 1989 में आरा से जीत
वर्ष 1989 में पहली बार बिहार के आरा लोकसभा क्षेत्र से रामेश्वर प्रसाद निर्वाचित हुए और 1990 में बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी के सात विधायक विजयी हुए। इसके बाद से बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी अपने उम्मीदवार उतारती आ रही है। बिहार के अलावा झारखंड, पंजाब, उत्तर प्रदेश जैसे कई अन्य राज्यों में पार्टी की उपस्थिति है।