बिहार के चुनावी दंगल में सभी राजनीतिक दल एक दूसरे पर हमलावर हो गए हैं। साथ ही वे मतदाताओं को यह दिलासा दे रहे हैं कि उन्हें मौका मिलता है तो लोगों के कष्ट दूर कर देंगे। इन लच्छेदार भाषणों के बीच बिहार के चुनावी माहौल में एक सवाल, जो अभी उठना शुरू हुआ है, उसने सभी नेताओं को परेशान कर दिया है। इस सवाल के कई भाग हैं, लेकिन उनका जवाब न तो भाजपा के दिग्गजों के पास है और न ही सुशासन बाबू यानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उस बाबत कुछ बोल पा रहे हैं।
'रेशमनगरी' कहा जाने वाला भागलपुर आज अपनी पहचान खोता जा रहा है। 'युवा हल्ला बोल' की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य अजित यादव ने 'बोल बिहारी' मुहिम के जरिए भागलपुर सुल्तानगंज में श्रावणी मेला कॉरिडोर और 'शिवा सर्किट' की मांग उठाई। पर्यटन उद्योग की असीम संभावनाओं के बावजूद यह क्षेत्र सरकारी उदासीनता का शिकार है।
पांच साल पहले प्रधानमंत्री ने आरा की जनसभा में सवा लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी। इसी के अंतर्गत भागलपुर के पास विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने की बात कही गई थी और 1550 करोड़ की लागत से एक मेगा स्किल विश्वविद्यायल बनना था, जिसमें एक लाख युवाओं को प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पैकेज पूरा कर देने की बात कही है, लेकिन पांच साल बाद न तो केंद्रीय विश्वविद्यालय का कोई अता पता है और न ही मेगा स्किल विश्वविद्यालय का।
नेशनल कोऑर्डिनेटर गोविंद मिश्र ने 'मॉडल एग्जाम कोड' के तहत सभी रिक्त पदों को भरने की मांग उठाई। हाईकोर्ट अधिवक्ता और राष्ट्रीय परिषद के सदस्य अतुल झा ने शिक्षा, शिक्षक और शिक्षा गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं बाबत नेताओं को घेरा। ऋषव रंजन का कहना था कि स्मार्ट सिटी के नाम पर जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है। भागलपुर का चुनाव यहां की गंदगी को साफ करने पर नहीं होता है तो इससे बड़ी शर्मिंदगी बिहार के लिए और कुछ नहीं हो सकती।