बिहार के पटना में 12 साल पहले 28 दिसंबर 2002 को हुए आशियाना नगर में फर्जी एनकाउंटर के मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी शम्से आलम को फांसी की सजा सुनाई है।
इस मामले में एक सिपाही समेत कुल 7 लोगों को सजा सुनाई गई है। इस एनकाउंटर में 3 छात्रों की हत्या के बाद उसे पुलिस मुठभेड़ बता दिया गया था।
छात्रों की हत्या पर काफी बवाल हुआ था जिसके बाद यह पूरा मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था। मामले में अदालत अब तक 8 लोगों को दोषी करार दे चुकी है।
क्या था पूरा मामला
तीन दोस्त विकास रंजन, प्रशांत और हिमांशु 28 दिसंबर 2002 को आशियाना नगर की एक दुकान पर एसटीडी फोन करने पहुंचे। फोन कॉल को लेकर हुए विवाद में वहां के व्यवसायियों ने पीट-पीट कर तीनों छात्रों को अधमरा किया फिर पुलिस ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी।
और तीनों छात्रों की मौत की खबर जब मीडिया तक पहुंची तो थानेदार शम्से आलम ने पुलिसिया मुठभेड़ की कहानी गढ़ दी।
लेकिन बहुत जल्द ही लोगों तक तीनों छात्रों के निर्दोष होने की बात पहुंची जिसके बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया।
7 लोगों को दोषी करार
इसके बाद इस मामले पर लगातार विरोध और आंदलोन किए गए जिसके बाद इस मामले की पूरी जांच सीबीआई के हाथों सौंप दी गई थी। सीबीआई ने 18 फरवरी 2003 को प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की।
इस पूरे मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी शम्से आलम और सिपाही अरुण कुमार सिंह को हत्या करने व साक्ष्य मिटाने का दोषी पाया।
वहीं सम्मेलन मार्केट के एसटीडी बूथ मालिक कमलेश कुमार, गौतम वर्मा, लाइट के मालिक राजीव कुमार रंजन, ड्राई क्लीनर्स के मालिक सोनी रजक, पाटलिपुत्रा सीडी दुकान के मालिक कुमुद कुमार, आरके इलेक्ट्रिकल्स के मालिक राकेश मिश्रा और दुकानदार कमलेश कुमार गौतम के एक रिश्तेदार अनिल कुमार को भी हत्या के प्रयास व साक्ष्य बदलने का दोषी ठहराया है।