बिहार में जनता की निगाहें आने वाले विधानसभा चुनावों से भी ज्यादा जनता परिवार के विलय पर हैं। आखिर हों भी क्यों न इसी परिवार के भविष्य पर ही बिहार की आगे की राजनीति की दशा और दिशा दोनों टिकी हुई हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या ये महाविलय होना इतना आसान है? क्या राजनीति के अलग-अलग ध्रुव एक मंच पर आ पाएंगे।
क्या मुलायम, लालू और नीतीश जैसे परस्पर विरोधी दल एक नाम, एक निशान पर सहमत हो पाएंगे। पिछले कुछ समय में बदलते राजनीतिक रंगों के बीच इस बात पर मुतर्मइन होना थोड़ा मुश्किल है। आइए निगाह डालते हैं उन पांच खास कारणों पर जिनसे जनता परिवार के महाविलय पर कुछ सवाल खड़े हो जाते हैं।
महाविलय पर सपाइयों में सहमति मुश्किल
जनता परिवार के महाविलय की धुरी जहां सपा मुखिया मुलायम सिंह हैं, उन्हें ही नई पार्टी का मुखिया भी चुना गया है लेकिन महाविलय में सबसे ज्यादा अड़चन भी उनकी ही पार्टी की ओर से आ रही है। वर्तमान में इस गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ही है, जिसके पास दस से ज्यादा सांसदों के अलावा सवा दौ सौ के करीब विधायकों का कुनबा है।
सपा के ये सभी जनप्रतिनिधि जनता परिवार में विलय कर उसकी ताकत तो बढ़ाएंगे लेकिन पार्टी को खुद के लिए कुछ खास नहीं मिल पाएगा। दूसरे सपा में मुलायम सिंह के परिवार की जो हनक है वो नई पार्टी में होना मुश्किल है। क्योंकि वहां पहले से ही लालू यादव, शरद यादव और नीतीश कुमार जैसे कद्दावर नेता मौजूद हैं।
यही कारण है कि नए विलय पर सबसे ज्यादा रोड़े मुलायम परिवार की ओर से ही अटकाए जा रहे हैं। मुलायम के छोटे भाई रामगोपाल जनता परिवार के औचित्य पर ही उंगली खड़ी कर चुके हैं। दूसरे विलय के बाद पार्टी को अपने चुनाव चिह्न और नाम से भी हाथ धोना पड़ेगा, जिसे समाजवादी कतई नहीं चाहेंगे।