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51 साल की तपस्या के बाद भी नहीं रुके इनके कदम

Fri, 25 Mar 2016 01:52 PM IST
संजीव श्रीवास्तव/अमर उजाला, नई दिल्ली
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कनॉट प्लेस पर पारस नाथ गुप्‍ता - फोटो : Sanjeev Srivastava
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तब पारस की उम्र 14 साल थी। घर की कमजोर माली हालत ने उसे पांचवीं के आगे पढ़ने नहीं दिया। गांव में रोजगार तो था नहीं और कोई धंधा शुरु करने की तो वो सोच भी नहीं सकता था।
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ये बाधाएं पारस के बाल मन में जन्म ले चुकी आगे बढ़ने की उसकी जिजीविषा का गला न घोंट सकी। उत्तर प्रदेश के बलिया जैसे बेहद पिछड़े जिले के एक छोटे से गांव के इस लड़के ने तय किया कि वो इस दलदल में धीरे-धीरे धंसते हुए खुद को खत्म नहीं होने देगा।

एक सुबह वो चल पड़ा और चलता ही रहा। जब रुका, तो खुद को असम की राजधानी गुवाहाटी में पाया। अगले 21 साल तक वो इसी शहर में खुद को बनाने की जद्दोजहद करता रहा लेकिन, कुछ खास हासिल न कर सका।
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एक बार फिर उसने चलने का फैसला किया और इस बार जब उसके कदम रुके तो वो देश की राजधानी दिल्ली में था। लेकिन अब पारस अकेला नहीं था। साथ में पत्नी और एक बेटा भी था।

पारस दिल्ली में पहले से रह रहे अपने एक रिश्तेदार के यहां पहुंचा और कुछ दिन के लिए आसरा देने की याचना की। बीवी और मासूम बच्चे को देख रिश्तेदार का दिल पसीज गया और इस परिवार को राजधानी में छत नसीब हो गई।

अगले दिन सुबह से ही पारस नौकरी की तलाश में जुट गया। पांचवीं पास पारस को जल्द ही एहसास हो गया कि उसे कोई ढंग का काम तो मिलने से रहा। परिवार का बोझ उसे और भी मजबूर बना चुका था। उसने तय किया कि वो आइसक्रीम की रेहड़ी लगाएगा। 

14 साल की उम्र में जिंदगी का सफर शुरु करने वाले पारस नाथ गुप्ता अब 65 साल के हैं। कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में लगे देश के सबसे ऊंचे तिरंगे से चंद कदमों की दूरी पर आज भी अपनी रेहड़ी पर वो मुस्कुराते हुए ग्राहकों का स्वागत करते दिख जाएंगे।
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कनॉट प्लेस पर पारस नाथ गुप्‍ता

पारस नाथ गुप्ता - फोटो : Sanjeev Srivastava
दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस का रूप-रंग पिछले 30 सालों में पूरी तरह बदल गया है लेकिन, पारस नाथ आज भी अपनी रेहड़ी संग उसी मुस्कान के साथ डटे हुए हैं। 30 साल पहले इसी कनॉट प्लेस पर पारस ने रेहड़ी लगा कर दिल्ली में पहली कमाई की थी। तब से आज तक उन्होंने ये जगह नहीं बदली। 

पारस ने जब अपने काम की शुरुआत की थी तो न सेंट्रल पार्क ऐसा दिखता था जैसा आज है और न ही ये ऊंचा तिरंगा था, न ही दिल्ली मेट्रो। इन 30 सालों में दिल्ली में बहुत कुछ बदला लेकिन, पारस ने दो चीजों का साथ नहीं छोड़ा। एक अपना धंधा यानि आइक्रीम की रेहड़ी और दूसरा अपना एक खास उसूल।

इस काम को शुरु करने के साथ ही पारस ने तय किया था कि वो अपने बेटे को कभी रेहड़ी पर खड़ा नहीं होने देंगे। इस उसूल को उन्होंने कभी टूटने नहीं दिया। पारस कहते हैं, 'यहां सामान बेचने वाले सभी के बच्चे रेहड़ी पर काम जरूर करते हैं लेकिन, मैंने आज तक पेशाब के लिए जाते वक्त भी अपने बेटे को रेहड़ी पर खड़ा नहीं किया।' 

इसकी वजह बताते हुए पारस कहते हैं, 'मैं मजबूरी के चलते पढ़ नहीं सका इसलिए, ये काम करना पड़ा। लेकिन, मैंने तय किया था कि मैं कभी अपने बेटे के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा।'

'मैंने अपनी जरुरतें कम रखीं और बेटे को पढ़ाने के लिए जो भी मदद हो सकी वो किया। मेरे बेटे ने भी पूरी मेहनत की और एमबीए की पढ़ाई की लेकिन, उसका सफर भी आसान नहीं था। एमबीए करने के बाद भी उसे ढंग की नौकरी नहीं मिली। मैंने उसे कमजोर नहीं होने दिया। मैने उससे कहा, अच्छी प्राइवेट नौकरी नहीं मिली तो क्या, तू सरकारी नौकरी के लिए कोशिश कर।'

बेटे ने सरकारी नौकरी के लिए कोशिश शुरु की और आखिर उसकी मेहनत रंग लाई। पारस का बेटा आज केंद्र सरकार का मुलाजिम है। बेटा सुबह जब तैयार होकर आईटीओ पर बने कैग (CAG) के ऑफिस के लिए घर से निकलता है तो पारस नाथ को अपनी 51 साल की मेहनत पर गर्व होता है।

बेटे के निकलने के बाद पारस तैयार होते हैं, खाना-पीना करते हैं और फिर से कनॉट प्लेस पर तिरंगे के नीचे आइसक्रीम की अपनी रेहड़ी पर पहुंच ग्राहक का इंतजार करने लगते हैं। 65 साल की उम्र में काम करने के लिए बेटा मना तो बहुत करता है लेकिन, पारस नाथ का मानना है ‌कि बैठने से इनसान बीमार पड़ जाता है। वो कहते हैं, 'काम करने से उन्हें थकान नहीं उर्जा मिलती है इसलिए, वो काम करते रहना चाहते हैं।'
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