बच्चों में शिक्षा की लौ जलाने के लिए राज भारती का जज्बा काबिले तारीफ है। रिफ्यूजी बच्चों से लेकर, भीख मांग कर गुजारा करने वाले बच्चों तक की शिक्षा के लिए उन्होेंने नि:शुल्क शिक्षा केंद्र खोले। मदद लेना उन्हें गवारा नहीं, जबकि मदद करना उनका शौक बन गया। भीख मांगने वाले गंदे कपड़ों मेें लिपटे बच्चों को नहलाना और उनके जख्मों पर दवा लगाकर उन्हें ऐसी संतुष्टि मिलती है, जिसकी तुलना और किसी भी उपलब्धि से नहीं की जा सकती। आंखों में एक नई दुनिया का ख्वाब लिए वे दिन-रात अपने सपने को हकीकत में बदलने के लिए काम करती रहती हैं।
बचपन से राज भारती को बतौर जेब खर्च 25 रुपये मिलते थे। इसे भी वे अनाथ एवं गरीब बच्चों की शिक्षा में खर्च कर देती थीं। युवा सेवा एवं खेल विभाग में सहायक असिस्टेंट पद से सेवानिवृत्त राज भारती ने अपने वेतन और पेंशन को भी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को पढ़ाने में लगा दिया।
गांधीनगर में बनाए गए अपने घर को भी कला प्रेमियों को समर्पित कर दिया। दूरदराज गांव से आए कला प्रेमी युवा इस घर में आकर चित्रकला और मुर्तिकला का अभ्यास करते हैं। पूरा घर उनके लिए खुला रहता है। विराज स्कूल, विराज कला केंद्र के नाम से समाज सेवा कर रहीं राज भारती का कहना है उनके पति का नाम वि (विधारत्न) से शुरू होता है और राज उनका अपना नाम है। इसी नाम के सहारे वह समाज सेवा कर रही हैं और विराज को ही अपना जीवन समर्पित कर दिया है।
राज भारती के अनुसार वर्ष 1947 में मोती बाजार में पाकिस्तान से आए अनाथ बच्चों को रखा गया। वे घायल थे। वे रोज वहां जाकर बच्चों को मरहम लगाती थीं। फिर अपनी बड़ी बहन के साथ मिलकर उनके लिए स्कूल शुरू किया।
मदद लेना गवारा नहीं, मदद करना बन गया शौक
raj bharti
- फोटो : Amar Ujala
राज भारती की अपनी शिक्षा के साथ यह सिलसिला लगातार चलता रहा। 1971 में भी मीरपुर कोटली से विस्थापित हुए बच्चे रिहाड़ी में आकर ठहरे। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए वह रिहाड़ी में एक कमरे में अपना स्कूल चलाने लगीं।
यहां बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाती थी। पिता उदव राम से मिलने वाले जेब खर्च के 25 रुपये में से 20 रुपये पर एक शिक्षक को रखा। आज वही स्कूल गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल रिहाड़ी के तौर पर काम कर रहा है।
सिलसिला यहीं थमा नहीं। राज भारती ने रिहाड़ी का स्कूल सरकार को सौंपा और चल पड़ी नई मंजिल की ओर। नरवाल में कचरा चुनने वाले बच्चों के लिए शिक्षा का केंद्र खोला। इन बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दी। कई बार बच्चे घर से नहीं आते थे तो उन्हें घर से खाने का लालच देकर दोबारा स्कूल में लाने का प्रयास करती रहीं। प्रयास से उनका संघर्ष भी आगे बढ़ता गया। इस स्कूल को भी सरकार ने एडाप्ट कर लिया।
पिछले 16 वर्षों से वे नगरोटा में बाजीगर बस्ती में भीख मांगकर गुजारा करने वाले बच्चों को पढ़ा रही हैं। अपनी पेंशन से चार शिक्षकों का वेतन दे रही हैं और स्वयं भी उनकी देखरेख कर रही हैं। खुले आसमान के नीचे चल रहे इस स्कूल में सौ बच्चे हैं और पांचवी तक की शिक्षा हासिल कर रहे हैं।
मृर्तिकार पति से जब उन्होंने पत्थरों को तराशकर किसी खास आकृति में ढालने की कला सीखी तो उनका कला की तरफ प्रेम बढ़ता चला गया। वह इस बात को लेकर दुखी हैं कि उनके द्वारा शुरू किए कुछ स्कूल तो सरकार ने ले लिए। अब जो स्कूल वे चला रही हैं और समाज सेवा का कार्य कर रही हैं, उसे आगे कौन बढ़ाएगा।
आज की पीढ़ी के लिए वे कहती हैं कि अपने देश में ही रहकर इसे खूबसूरत बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए। लोगों के बच्चे विदेश जा रहे हैं और घर वृद्धाश्रम बन रहे हैं। ऐसे में घर में बुजुर्गों की देखभाल कौन करेगा। नई पीढ़ी को सामाजिक बदलाव के लिए आगे आना चाहिए।