सेना की गाड़ियों का नंबर कैसा होता है
भारतीय सेना की गाड़ियों का भी रजिस्ट्रेशन आम जनता की गाड़ियों जैसा नहीं होता। ये गाड़ियां आरटीओ से नहीं बल्कि रक्षा मंत्रालय के अपने इंटरनल सिस्टम से रजिस्टर्ड होती हैं। सार्वजनिक वाहनों के विपरीत, सैन्य वाहन रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रबंधित एक अलग पंजीकरण प्रणाली का पालन करते हैं। इनकी नंबर प्लेट में एक खास पहचान होती है — एक तीर (↑) का निशान।
इस तीर के बाद दो अंकों का वर्ष होता है, जैसे "25" का मतलब है साल 2025 में रजिस्टर हुई गाड़ी। इसके बाद कुछ अक्षर और संख्या होती है, जो गाड़ी की कैटेगरी और यूनिक पहचान को दर्शाती हैं। उदाहरण के तौर पर: ↑ 25 B 123456.
सेना की गाड़ियों की नंबर प्लेट काले बैकग्राउंड पर सफेद अक्षरों में होती है, जो आम नागरिकों की गाड़ियों से अलग दिखती हैं। अगर कोई सैन्य वाहन आम जनता को बेच दिया जाए (जैसे नीलामी में), तो फिर उसे आरटीओ में रजिस्टर कराना और सामान्य नंबर प्लेट लगाना जरूरी होता है।
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भारत में नंबर प्लेट का इतिहास
भारत में आज हम जिस नंबर प्लेट सिस्टम को जानते हैं, उसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। 1914 में "भारतीय मोटर व्हीकल एक्ट" लाया गया, जिसके तहत गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन और ड्राइविंग लाइसेंस अनिवार्य किया गया। इससे पहले भारतीय राजाओं और नवाबों की शाही सवारियों का कोई औपचारिक रजिस्ट्रेशन नहीं होता था।
ब्रिटिश काल में भारत की रियासतों की गाड़ियों पर खास नंबर प्लेटें होती थीं, जिनमें उनके राज्य का नाम या प्रतीक अंकित होता था। जैसे जयपुर स्टेट की गाड़ियों पर 'JP', ग्वालियर पर 'GWL', हैदराबाद पर 'HYD', और बड़ौदा पर 'BRD' लिखा होता था।
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शाही गाड़ियां और उनकी अनोखी पहचान
आजादी से पहले भारत के कई राजाओं और नवाबों की गाड़ियों पर न तो नंबर होता था और न ही आरटीओ जैसी कोई प्रक्रिया। उनकी गाड़ियों पर अक्सर राज्य की मुहर, प्रतीक या राजा का नाम अंकित होता था। हैदराबाद के नवाब की Rolls-Royce (रोल्स-रॉयस) पर 'HYD' लिखा होता था, वहीं जयपुर के महाराजा की Bugatti पर राजकीय मोनोग्राम होता था। हालांकि इसे ब्रिटिश सरकार ने औपचारिक रूप से रजिस्टर किया था। पटियाला के महाराजा के पास 44 रोल्स-रॉयस गाड़ियाँ थीं, जिन पर उनके राज्य का चिन्ह लगा होता था।
आजादी के बाद, सभी शाही परिवारों की गाड़ियों को आम नागरिकों की तरह ही रजिस्टर करना जरूरी हो गया।
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भारत में पहली बार रजिस्टर हुई गाड़ी कौन-सी थी?
भारत में पहली बार जिस गाड़ी का औपचारिक रजिस्ट्रेशन हुआ, वह मुंबई (तब बंबई) में हुआ था। इस गाड़ी को रजिस्ट्रेशन नंबर 'MH-01' दिया गया था। ऐसा माना जाता है कि यह गाड़ी या तो किसी ब्रिटिश नागरिक की थी या किसी भारतीय व्यवसायी की।
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कैसे बदला भारत में नंबर प्लेट सिस्टम
1914 में जब पहली बार मोटर व्हीकल एक्ट आया, तब से गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन की शुरुआत हुई। इसके बाद 1939 में नए एक्ट ने नंबर प्लेट के फॉर्मेट और नियमों को और स्पष्ट किया। फिर 1989 में केंद्र सरकार ने पूरे देश में नंबर प्लेट का डिजाइन एक जैसा करने का नियम लागू किया। और आखिर में 2019 में हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट (HSRP) अनिवार्य की गईं, ताकि छेड़छाड़ और फर्जी नंबर प्लेट से बचा जा सके।
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विदेशों में नंबर प्लेट की शुरुआत कैसे हुई?
दुनिया में सबसे पहले नंबर प्लेट लगाने का चलन फ्रांस में 1893 में शुरू हुआ था। वहां बढ़ते सड़क हादसों और गाड़ियों की संख्या को देखते हुए एक व्यवस्थित पहचान प्रणाली की जरूरत महसूस की गई। इसके बाद ब्रिटेन में 1903 और जर्मनी में 1906 में नंबर प्लेट अनिवार्य कर दी गईं। अमेरिका के कई राज्यों में भी 20वीं सदी की शुरुआत में इसी तरह के कानून लाए गए।
भारत में इस प्रक्रिया की शुरुआत अंग्रेजों के जरिए हुई थी, लेकिन 18वीं सदी के कुछ शाही वाहन पहले से ही अपने राज्य या राजा के नाम या प्रतीक को गाड़ी पर लगाते थे, जो आज की नंबर प्लेट की तरह पहचान का माध्यम था।
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