भारत में पहली बार, ऑटो पार्ट्स के लिए 'ट्रक ऑन ट्रेन' सर्विस को वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर पर बुधवार को शुरू किया गया। जिससे भारत के दो सबसे बड़े विनिर्माण केंद्रों के बीच एक सीधा और बहुत छोटा रास्ता खुल गया।
गुरुग्राम और मानेसर कारखानों में शुरुआत में रखे गए मारुति ऑटो पार्ट्स से लदे तीन ट्रकों को 12 घंटों में नई रेवाड़ी से गुजरात के पालनपुर तक वैगनों पर ले जाया गया। वहां पहुंचने के बाद, ट्रक ट्रेन से उतरकर लगभग एक घंटे की दूरी पर स्थित मेहसाना में ऑटोमेकर की फैक्ट्री में पुर्जे पहुंचाएंगे।
सड़क मार्ग से, यह 700 किलोमीटर की यात्रा में आमतौर पर एक दिन लगता है।
सेवा शुरू करने वाली समर्पित माल गलियारा कंपनी इंडिया लिमिटेड (डीएफसीसीआईएल) के अधिकारियों ने गुरुवार को कहा कि रेवाड़ी स्टेशन में हर तीन घंटे में ऐसी ट्रेनें भेजने की क्षमता है और एक दिन में लगभग 250 ट्रक ले जा सकती है। उन्होंने कहा कि आखिरकार, इस क्षमता को बढ़ाकर 1,000 ट्रक प्रतिदिन कर दिया जाएगा।
'ट्रक ऑन ट्रेन' कॉन्सेप्ट, जिसे रोल-ऑन, रोल-ऑफ (आरओ-आरओ) के रूप में भी जाना जाता है, का लक्ष्य परिवहन को सड़कों से रेलवे पर शिफ्ट करके कार्बन फुटप्रिंट को कम करना है। इस पद्धति का समर्थन केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने किया था. जिन्होंने पहले कहा था कि यह सेवा देश भर में ग्रीन लॉजिस्टिक इकोसिस्टम (हरित रसद पारिस्थितिकी प्रणालियों) को बनाने में मदद करेगी।
इस पद्धति में, ट्रकों को माल के साथ या बिना माल के रैंप के जरिए वैगनों पर लोड किया जाता है। लोड करने से पहले, ट्रकों का वजन किया जाता है और ऊंचाई गेज के नीचे से गुजारा जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे सभी नियमों के अनुरूप हैं।
यह पहली बार था जब देश में इस सर्विस के जरिए ऑटो पार्ट्स को भेजा गया था।
लॉजिस्टिक कंपनी का कहना है कि पारिस्थितिकीय लाभों के अलावा, यह ट्रक ऑन ट्रेन पद्धति कई ट्रांजिट पॉइन्टस (पारगमन बिंदुओं) पर सामानों को संभालने को आसान बनाती है। साथ ही ट्रांजिट टाइम (पारगमन समय), क्षति और सड़क की रुकावट को भी कम करती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप, उच्च कार्यभार के कारण फ्लीट ड्राइवरों की कमी को दूर करता है और साथ ही वाहन के रोड लाइफ को बढ़ाता है।
वाहन निर्माता का कहना है कि उन्होंने हरित परिवहन की नीति अपनाई है।
कंपनी ने अपने लगभग 20 प्रतिशत कार बेड़े को रेलवे के जरिए परिवहन करना शुरू कर दिया है। वे इस समय पुर्जों की आवाजाही शुरू करते हुए इसे और बढ़ाने का इरादा रखते हैं।
भारत के ऊर्जा और संसाधन संस्थान (टीईआरआई) द्वारा अगस्त 2022 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में पाया गया कि ट्रक भारत भर में माल ले जाने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले परिवहन के साधन हैं। जो शहरी क्षेत्रों में लगभग 40 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं।
डीएफसीसी के एक अधिकारी ने कहा कि हालांकि ट्रक ऑन ट्रेन सेवा परिवहन का एक नया सेगमेंट है, लेकिन इसके लिए निजी क्षेत्र में काफी मांग है।
"ऐसा इसलिए है क्योंकि एक ट्रक ऑपरेटर इस मोड के माध्यम से तीन तरीकों से पैसा बचा
अधिकारी ने बताया, "ऐसा इसलिए है क्योंकि एक ट्रक ऑपरेटर इस मोड के जरिए तीन चीजों पर पैसा बचाता है - ईंधन की लागत, हाईवे टोल टैक्स और वाहन के टूट-फूट।" उन्होंने यह भी कहा कि यह अंतिम छोर तक संपर्क की समस्याओं को भी कम करता है।
डीएफसीसी की RoRo सर्विस पश्चिमी माल गलियारे पर पहली है। RoRo को 1999 में कोंकण रेलवे पर शुरू किया गया था, और यह अभी भी चालू है। 2016 में, दक्षिण पश्चिम रेलवे ने इसे अपने बंगलूरू-सोलापुर मार्ग पर अपनाया था, लेकिन कुछ ही यात्राओं के बाद यह सेवा रोक दी गई थी।