छोटे पेट्रोल वाहनों को राहत से ईवी अपनाने पर असर का तर्क
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई स्थित वाहन निर्माता ने पीएमओ में शक्तिकांत दास को लिखे अपने पत्र में कहा है कि 909 किलोग्राम तक वजन, 1200 सीसी तक इंजन क्षमता और 4,000 मिमी तक लंबाई वाले पेट्रोल वाहनों को कैफे मानकों से छूट देना भारत में स्वच्छ और टिकाऊ तकनीकों को अपनाने की रफ्तार को धीमा कर सकता है। कंपनी के मुताबिक, इस तरह की छूट से उन प्रयासों को झटका लगेगा, जो भविष्य की तकनीकों में छलांग लगाने के लिए किए जा रहे हैं।
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ईवी बिक्री में बढ़ोतरी का हवाला, नियमों में ढील पर चेतावनी
टाटा मोटर्स ने यह भी रेखांकित किया कि भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर किए गए प्रयास अब नतीजे दिखाने लगे हैं। और यात्री वाहनों की कुल बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी करीब 5 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। कंपनी का मानना है कि इस अहम मोड़ पर अगर कैफे मानकों में ढील दी गई, तो ईवी अपनाने की मौजूदा गति कमजोर पड़ सकती है और नीति की दिशा को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है।
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वाहन सुरक्षा को लेकर भी जताई गंभीर चिंता
ईंधन दक्षता के साथ-साथ टाटा मोटर्स ने सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर भी सवाल उठाए हैं। कंपनी का कहना है कि अगर वजन के आधार पर छूट दी जाती है, तो इससे वाहन निर्माता जरूरी सुरक्षा फीचर्स को हटाकर वजन कम करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। ऐसा होने पर पिछले कुछ वर्षों में वाहन सुरक्षा के क्षेत्र में हासिल की गई प्रगति को नुकसान पहुंचने का खतरा है।
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विशेष श्रेणी बनाने के खिलाफ सरकार से अपील
कंपनी ने सरकार से आग्रह किया है कि कैफे मानकों में रियायत देने के लिए आकार या वजन के आधार पर वाहनों की कोई अलग श्रेणी न बनाई जाए। टाटा मोटर्स के अनुसार, ऐसा कदम शून्य-उत्सर्जन तकनीकों की दिशा में बढ़ते कदमों, सड़क सुरक्षा और सभी वाहन निर्माताओं के लिए समान प्रतिस्पर्धी माहौल के विपरीत होगा।
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ड्राफ्ट CAFE नियमों की पृष्ठभूमि
टाटा मोटर्स की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है, जब सरकार ने अप्रैल 2027 से मार्च 2032 की अवधि के लिए ड्राफ्ट कैफे नियम जारी किए हैं। इस प्रस्तावित ढांचे के तहत वाहन निर्माताओं के लिए फ्लीट स्तर पर ईंधन दक्षता और कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य और सख्त किए गए हैं, हालांकि छोटे पेट्रोल वाहनों के लिए कुछ राहत उपाय भी सुझाए गए हैं।
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नीति की स्थिरता से भारत बन सकता है ईवी लीडर
कंपनी ने दोहराया कि कैफे मानकों का मूल उद्देश्य वाहन निर्माताओं को अपने पूरे पोर्टफोलियो में टिकाऊ तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है। किसी एक उप-श्रेणी को छूट देने से इलेक्ट्रिक वाहनों जैसी तकनीकों में निवेश का प्रोत्साहन कम हो सकता है। टाटा मोटर्स का मानना है कि यदि नीति में स्थिरता बनी रही और फोकस बरकरार रखा गया, तो आने वाले वर्षों में भारत शून्य-उत्सर्जन वाहनों के निर्माण और उपयोग में अग्रणी देशों में शामिल हो सकता है।
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