सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा प्राधिकरण शुल्क/सीमा कर वसूलने की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह का निपटारा किया। और याचिकाकर्ताओं को राहत के लिए क्षेत्राधिकार वाले उच्च न्यायालयों में जाने की स्वतंत्रता दी।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा प्राधिकरण शुल्क/सीमा कर वसूलने की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह का निपटारा किया। और याचिकाकर्ताओं को राहत के लिए क्षेत्राधिकार वाले उच्च न्यायालयों में जाने की स्वतंत्रता दी।
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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कई ट्रांसपोर्टर्स और टूर ऑपरेटरों द्वारा दायर याचिकाओं पर फैसला सुनाया। जिन्होंने कहा था कि प्राधिकरण शुल्क/सीमा कर का संग्रह कथित रूप से अखिल भारतीय पर्यटक वाहन (परमिट) नियम, 2023 के उल्लंघन में किया जा रहा था।
कुछ याचियों ने राज्यों द्वारा पहले ही वसूली गई राशि की वापसी की भी मांग की।
पीठ ने कहा, "चूंकि राज्य अधिनियमों, नियमों और विनियमों को चुनौती नहीं दी जा रही है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि संबंधित राज्य सरकारों द्वारा सीमाओं पर सीमा कर/प्राधिकरण शुल्क की मांग कानून के तहत गलत है। याचियों को सफल होने के लिए अधिनियम में निहित राज्य प्रावधान को चुनौती देने पर विचार करना होगा।"
पीठ ने कहा, "हम मामले के मेरिट्स (गुणों) पर विचार नहीं कर रहे हैं। इसका एक और कारण यह है कि याचियों को पहले अपने-अपने क्षेत्रीय उच्च न्यायालयों में जाकर अपने-अपने राज्य के अधिनियमों को चुनौती देनी चाहिए थी।"
पीठ ने राज्यों द्वारा की जा रही मांगों में हस्तक्षेप किए बिना याचिकाओं का निपटारा किया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने न तो मामले के गुणों में प्रवेश किया है और न ही इसकी जांच की है।
इसने कहा कि पहले से वसूल किया गया टैक्स उच्च न्यायालयों के समक्ष दायर की जा सकने वाली याचिकाओं के अंतिम नतीजे के अधीन होगा।
पीठ ने कहा कि इन मामलों में पहले नोटिस जारी करते समय, अंतरिम राहत दी गई थी। और राज्यों को सीमा कर/प्राधिकरण शुल्क की कोई और वसूली करने से रोक दिया गया था।
पीठ ने कहा, "हालांकि पक्षों के वकीलों ने मेरिट्स पर अपने तर्क रखे हैं, हम इस स्तर पर मामले के गुणों में जाने के इच्छुक नहीं हैं। क्योंकि जाहिर है, तय किया जाने वाला मूलभूत सवाल यह होगा कि संबंधित राज्यों द्वारा करों का लगाना और वसूली करना अधिनियम और संबंधित राज्यों द्वारा संविधान की अनुसूची VII की सूची II की प्रविष्टि 56 और 57 के तहत बनाए गए नियमों के अंतर्गत आता है या नहीं।"
पीठ ने कहा, "जहां तक इस न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश की अवधि का सवाल है, याचिकाकर्ता उच्च न्यायालयों के समक्ष यह वचन देंगे कि यदि वे असफल होते हैं, तो वे उस अवधि के लिए उठाए गए मांगों को पूरा करेंगे, जिसके लिए स्टे का आनंद लिया गया है।"