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Traffic Signal: कोटा बना देश का पहला ट्रैफिक-सिग्नल मुक्त शहर, क्या यह मॉडल अन्य शहरों में भी हो सकता है लागू?

Mon, 24 Nov 2025 09:25 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कोटा का सिग्नल-फ्री मॉडल शहरी गतिशीलता में बदलाव की दिशा दिखाता है। लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि हर शहर के लिए एक ही समाधान उपयुक्त नहीं होता।
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Representative Image - फोटो : Freepik
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विस्तार
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21वीं सदी के शहरों के लिए शहरी गतिशीलता सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुकी है। बढ़ती आबादी और वाहनों की निरंतर वृद्धि ने पारंपरिक ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम को समाधान से ज्यादा बाधा में बदल दिया है। यही कारण है कि अब कई नगर नियोजक यह सवाल उठाने लगे हैं कि क्या भविष्य के शहरों को सिग्नल-फ्री होना चाहिए?
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राजस्थान के कोटा ने इस सवाल का जवाब देते हुए देश में एक नया अध्याय शुरू कर दिया है। शहर का सड़क ढांचा इस तरह से पुनर्निर्मित किया गया है कि वाहनों की आवाजाही बिना रुकावट लगातार चल सके। इसी पुनर्संरचना के कारण कोटा इस महीने भारत का पहला ट्रैफिक-लाइट मुक्त शहर बन गया। 

यह बदलाव अर्बन इंप्रूवमेंट ट्रस्ट (UIT), कोटा के नेतृत्व में हुआ, जिसे 1959 के राजस्थान अर्बन इम्प्रूवमेंट एक्ट के तहत शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था।
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कैसे कोटा बना सिग्नल-फ्री
कोटा की नई यातायात प्रणाली का आधार ग्रेड-सेपरेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर है। यानी जहां ट्रैफिक सिग्नल की जरूरत हो सकती थी, वहां फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए गए हैं।
इन प्रमुख बदलावों ने सिग्नल पर निर्भरता खत्म कर दी:
  • महत्वपूर्ण चौराहों पर फ्लाईओवर व अंडरपास
  • शहर के भीतर से ट्रैफिक हटाने के लिए रिंग रोड
  • स्मूद मूवमेंट के लिए राउंडअबाउट और वन-वे मार्ग
  • स्पष्ट साइनबोर्ड, लेन मार्किंग और अनुशासन आधारित ड्राइविंग
  • भीड़भाड़ के समय पैदल यात्रियों के लिए स्वयंसेवकों व पुलिस की मदद
इन सुधारों से यात्रियों को अल्प समय में यात्रा, कम ईंधन खर्च और दुर्घटनाओं में कमी जैसे लाभ मिल रहे हैं।

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क्या कोटा मॉडल भारत के बाकी शहरों में लागू हो सकता है?
कोटा का मॉडल भारतीय शहरी परिवहन को नई दिशा देता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि हर शहर को पूर्ण सिग्नल-फ्री बनाना संभव नहीं है। कई शहरों ने अलग-अलग तरीकों से ट्रैफिक सुधार की कोशिशें शुरू की हैं:

इंदौर
देश का सबसे स्वच्छ शहर माने जाने वाला इंदौर एआई आधारित इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) का उपयोग कर रहा है। इसके माध्यम से अनुकूल (एडाप्टिव) सिग्नल, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और स्मार्ट सर्विलांस लागू किया जा रहा है।

बोकारो, झारखंड
बोकारो लंबे समय से बहुत कम ट्रैफिक सिग्नलों के साथ काम करता है। चौड़ी सड़कें, अनुशासित ड्राइविंग और न्यूनतम हस्तक्षेप इसके प्रमुख कारण हैं।

हैदराबाद
हैदराबाद ने पूरी तरह सिग्नल हटाए नहीं, पर कई इंटरसेक्शनों पर फ्री-लेफ्ट टर्न लागू कर प्रतीक्षा समय कम किया है।

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सिग्नल-फ्री बनाम स्मार्ट-सिग्नल ट्रैफ़िक सिस्टम
सिग्नल-फ्री इंफ्रास्ट्रक्चर से:
  • जाम में उल्लेखनीय कमी
  • यात्रा समय की निश्चितता
  • ईंधन की बचत
  • वाहन उत्सर्जन कम होने से बेहतर वायु गुणवत्ता

ग्रेड-सेपरेशन के कारण दुर्घटनाओं में कमी
सिग्नल-फ्री सिस्टम होने पर पीछे से टकराने वाली दुर्घटनाओं का जोखिम भी घटता है, और पब्लिक ट्रांसपोर्ट, इमरजेंसी सेवाओं और लॉजिस्टिक्स को भी समयबद्धता मिलती है।

दुनिया में कुछ शहर भी इस मॉडल की ओर बढ़े हैं। उदाहरण के तौर पर भूटान की राजधानी थिम्फू जहां पारंपरिक ट्रैफिक सिग्नल नहीं हैं। ट्रैफिक मुख्यतः मानव निर्देश व राउंडअबाउट से संचालित होता है। यूके का स्टीवनाज, जहां अधिकतर चौराहे राउंडअबाउट आधारित हैं और सिग्नल कम हैं।

शहरी डिजाइनर बेन हैमिल्टन-बैली ने एम्स्टर्डम और बर्न जैसे शहरों में 'शेयर्ड स्पेस' मॉडल लागू किया। जहां डिजाइन लोगों को अधिक सतर्क बनाकर सड़कों को सुरक्षित बनाता है, न कि सिग्नलों के सहारे। 

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चंडीगढ़ का अनुभव: राउंडअबाउट से सिग्नल की ओर यात्रा
भारत में चंडीगढ़ वह शहर है जिसने पहले राउंडअबाउट आधारित ढांचे से शुरुआत की थी। शुरुआती दशकों में शहर में कम ट्रैफिक सिग्नल थे और कई चौराहे बिना सिग्नल के काम करते थे।
लेकिन समय के साथ जनसंख्या और वाहनों की संख्या बढ़ने से राउंडअबाउट जाम और असुरक्षित होने लगे, जिसके बाद धीरे-धीरे ट्रैफिक सिग्नल लगाए गए। आज चंडीगढ़ के हर सिग्नल पर ITMS आधारित सीसीटीवी निगरानी है।

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क्या कोटा मॉडल बड़े महानगरों में संभव है
विशेषज्ञों का कहना है कि कोटा जैसा डिजाइन-आधारित मॉडल केवल मिड-साइज शहरों में पूरी तरह प्रभावी हो सकता है। दिल्ली, मुंबई, बंगलूरू जैसे महानगरों में अत्यधिक ट्रैफिक वॉल्यूम, घनी आबादी, जटिल यात्रा पैटर्न के चलते पूर्ण सिग्नल-फ्री मॉडल लागू करना कठिन है।

इसके अलावा, सिग्नल-फ्री ढांचा भी निरंतर रखरखाव, ट्रैफिक अनुशासन और सख्त प्रवर्तन की मांग करता है।

कोटा का सिग्नल-फ्री मॉडल शहरी गतिशीलता में बदलाव की दिशा दिखाता है। लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि हर शहर के लिए एक ही समाधान उपयुक्त नहीं होता। बेहतर योजना, तकनीक, सड़क डिजाइन और अनुशासन, इन सभी का संतुलित संयोजन ही भविष्य के यातायात का आधार बन सकता है। 

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