एएलएमएस इंडिया के प्रबंध निदेशक अनिल कुमार ने कहा कि इससे निपटने और सरकार के प्रयासों का समर्थन करने के लिए कंपनी ने वेंटिलेटर बनाने का काम करना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि हम ह्यूंदै मोटर इंडिया के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं। इससे कंपनी के प्रयासों में एक सकारात्मक बदलाव आएगा। साथ ही, उन्होंने कहा कि देश में वेंटिलेटर के लिए शोध और सुविधा रखने वाली एएलएमएस कुछ ही वैश्विक कंपनियों में से एक हैं।
बता दें कि ऑटोमोबाइल कंपनियां भारत ही नहीं अन्य देशों में भी वेंटिलेटर बनाने का काम कर रही हैं। रॉल्स रॉयस, एयरबस, जगुआर लैंड रोवर और यूनिपार्ट सहित 60 से अधिक कार निर्माता कंपनियां वेंटिलेटर बनाने का काम कर रही हैं। उम्मीद है कि यह कंपनियां 20 हजार वेंटिलेटर बनाने में मदद करेंगी। वेंटिलेटर निर्माता हैमिल्टन मेडिकल के सीईओ जेन्स हालेक ने कहा कि वेंटिलेटर बनाने के लिए आवश्यक सामग्री और इसके बारे में जानकारी होना बहुत आवश्यक है। क्योंकि वेंटिलेटर बनाना कोई आसान काम नहीं है।
न केवल हार्डवेयर बल्कि इसमें बहुत सारे सॉफ्टवेयर भी होते हैं। हालेक कहते हैं कि यदि कोई एक भी हिस्सा ठीक से काम नहीं करता है, तो फिर वह पूरी मशीन बंद जो जाती है और फिर उसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। हैमिल्टन मेडिकल एक सप्ताह में 220 वेंटिलेटर बनाता है। हालांकि इन्हें एक सप्ताह में 400 वेंटिलेटर बनाने की उम्मीद है।
वहीं डॉक्टरों का कहना है कि वेंटिलेटर बनाना आसान काम नहीं है क्योंकि इसमें सर्किट, एक इंस्पिरेट्री फ्लो रेगुलेटर और कई सेंसर, फिल्टर, वॉल्व और अलार्म जैसी चीजों का उपयोग होता हैं। सीधे तौर पर कहें तो यह एक मुश्किल प्रक्रिया है। ऑटो इंडस्ट्री के विशेषज्ञ और विश्वविद्यालय में प्रबंधन प्रोफेसर एडिनबर्ग कहते हैं कि मोटर वाहन निर्माता या अन्य कोई भी निर्माता जो कि चिकित्सा उपकरणों से अच्छी तरह से वाकिफ नहीं है उन्हें यह काम नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वेंटिलेटर की संख्या और उनके निर्माण की प्रक्रिया केवल एक चीज नहीं है बल्कि इसका निर्माण करते समय बहुत सोचने की आवश्यता है। वेंटिलेटर जैसे मेडिकल उपकरणों को सही तरीके से जांचने की भी जरूरत होती है।