2013 की याचिका पर आया फैसला
यह फैसला एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर आया है, जो साल 2013 में दायर की गई थी। इस याचिका में मुंबई और महाराष्ट्र की सड़कों की "खस्ताहाल हालत" और गड्ढों की वजह से बढ़ते हादसों पर चिंता जताई गई थी। कोर्ट ने कहा कि सड़कों का ठीक हालत में होना नागरिकों का बुनियादी अधिकार है।
जस्टिस ने कहा, "भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को सुरक्षित और ठीक सड़कों पर चलने का अधिकार है। खराब और असुरक्षित सड़कों के लिए कोई भी बहाना स्वीकार्य नहीं हो सकता। अगर सरकार सिर्फ निर्देश देती रहे और मुआवजा न दे, तो यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का मजाक उड़ाने जैसा होगा।"
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6 से 8 हफ्तों में देना होगा मुआवजा, देरी पर ब्याज लगेगा
कोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार को दावा दर्ज होने के 6 से 8 हफ्तों के भीतर मुआवजा देना होगा। अगर इसमें देरी होती है, तो मुंबई महानगरपालिका (BMC), जिला कलेक्टर, MMRDA, MSRDC, PWD, NHAI और बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट (BPT) जैसी एजेंसियों के प्रमुखों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
देरी की स्थिति में, मुआवजे पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। जो दावा दाखिल करने की तारीख से लेकर भुगतान की तारीख तक लागू रहेगा।
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48 घंटे में भरने होंगे गड्ढे, वरना होगी कार्रवाई
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि अगर किसी सड़क पर गड्ढे की सूचना मिलती है, तो उसे 48 घंटे के भीतर भरना अनिवार्य है। अगर अधिकारी ऐसा करने में असफल रहते हैं, तो उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
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