केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 तक 87 लाख वाहन ऐसे थे, जो अपनी अपनी तय उम्र पूरी कर कबाड़ में जाने लायक हो गये थे। क्योंकि इनसे जबरदस्त प्रदूषण हो रहा था। सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 तक ऐसे वाहनों का आंकड़ा 2.18 करोड़ तक होने का अनुमान है। यानी तकरीबन सवा दो करोड़ वाहनों को कबाड़ करने की ज़रूरत पड़ेगी।
वाहनों से होने वाले प्रदूषण और स्क्रैप पॉलिसी को लेकर लंबे समय से केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय कहती हैं कि इस नीति से देश में वाहनों की वजह से होने वाले प्रदूषण में बहुत ही कमी आएगी। उन्होंने सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि इस योजना को केंद्र सरकार ने लागू करके प्रदूषण को कम करने की दिशा में एक बड़ा काम किया है।
उनके मुताबिक जितनी जल्दी इस नीति के तहत वाहनों को कबाड़ करना शुरू कर दिया जाएगा, उतनी जल्दी ही बढ़ते हुए प्रदूषण से राहत मिलनी शुरू हो जाएगी। अनुमिता के मुताबिक वाहनों से होने वाले प्रदूषण में 70 फीसदी प्रदूषण पुराने वाहनों की वजह से सबसे ज्यादा होता है।
वाहनों से लगातार होने वाले प्रदूषण और उससे आम लोगों के जनजीवन पर पड़ने वाले असर को लेकर आईआईटी मुंबई और इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन ने 2013 और 2014 में एक सर्वे किया। सर्वे की रिपोर्ट को केंद्र सरकार के साथ साझा किया गया ताकि वाहन स्क्रैप पॉलिसी को जल्द से जल्द बनाया जा सके। दोनों संस्थाओं के सर्वे से एक बात स्पष्ट हुई की सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों से प्रदूषण सबसे ज्यादा होता है। इसमें दस से पंद्रह साल पुराने वाहन सबसे ज्यादा प्रदूषण करते हैं।
आईआईटी मुंबई की मल्टीसिटी रिपोर्ट के मुताबिक 2005 से पहले के वाहन जो अभी भी सड़को पर दौड़ रहे हैं उनसे तय मानकों की तुलना में 70 फीसदी प्रदूषण ज्यादा होता है। जबकि इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन के सर्वे के मुताबिक 2013 में एक चौथाई वाहन ऐसे थे जो 2003 से पहले के थे। यानिकि इस वक़्त ये एक चौथाई वाहन तो अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं और खूब प्रदूषण कर रहे हैं।
केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय की भी एक रिपोर्ट के मुताबिक सन 2000 से पहले निर्मित वाहनों से होने वाला प्रदूषण आज के वाहनों की तुलना में 25 गुना ज्यादा होता है। ऐसे वाहन जब सड़कों पर चलते हैं, तो तकरीबन 70 फीसदी प्रदूषण ज्यादा करते हैं। ऐसे में पुराने वाहनों को हटाना ही बेहतर विकल्प हैं।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की अनुमिता बताती है शुरुआती दौर में भारत स्टेज-वन और भारत स्टेज-टू की जो गाड़ियां सड़कों पर आईं, वह भी अपने तय मानकों के मुताबिक नहीं थीं। उन वाहनों से जो प्रदूषण होता था वह तय मानकों से ज्यादा होता था। उन्होंने बताया इस वक्त बीएस-6 स्टैंडर्ड की गाड़ियां बन रही हैं, इनकी तुलना अगर बीएस-4 स्टैंडर्ड की गाड़ियों से करते हैं तो पाएंगे कि इस वक्त पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण में 70 फीसदी से ज्यादा का सुधार हुआ है।