आजकल कार कंपनियां बेहद रिफाइंड इंजन बना रही हैं। जो शोर भी नहीं करते और प्रदूषण भी काफी कम करते हैं। ऐसे में गाड़ियों से धुंआ न के बराबर निकलता है। लेकिन शायद आप नहीं जानते कि डीजल और पेट्रोल कार में अलग-अलग रंग का धुंआ निकलता है। आमतौर पर कार से अगर धुंआ निकलता भी दिखाई दे तो परेशानी वाली कोई बात नहीं है लेकिन अगर पेट्रोल कार से नीले रंग का और डीजल कार से काले रंग का धुंआ निकल रहा है तो यह बेहद खतरनाक है।
पेट्रोल कार: अगर आपकी कार से नीले रंग का धुंआ निकलता दिखाई दे तो यह इस बात का संकेत है कि पिस्टन रिंग घिस रही है जिसकी वजह से कम्बशन चैंबर में इंजन ऑयल जा रहा है। इसका मतलब आपकी गाड़ी जल्द ही ब्रेक डाउन कहीं भी हो सकती है यानी बंद पड़ सकती है।
डीजल कार: यदि डीजल कार से काले रंग का धुंआ आने लगे तो यह इस बात की तरफ इशारा करता है कि ईसीजी फेल हो गया है या फ्यूल इंजेक्टर बंद हो गया है। इसके अलावा यह इस बात का भी संकेत है कि इंजन बिना सर्विस के काफी ज्यादा चल चुका है। यदि ऐसे लक्षण आपको नजर आये तो तुरंत अपनी कार को सर्विस सेंटर लेकर जाएं।
पहले के मुकाबले आजकल ज्यादातर गाड़ियों में हाई परफॉरमेंस इंजन आ रहे हैं। यदि वजह है कि इंजन भी हाई प्रेशर पर काम करते हैं जिसकी वजह से इंजन का तापमान बढ़ जाता है। ऐसे में इस तापमान को कंट्रोल में रखने के लिए इंजन लिक्विड कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल करता है। लिक्विड कूलिंग का काम होता है कि वह इंजन से हीट को हीट एक्सचेंजर यानी रेडिएटर के जरिए बाहर निकाले। इसलिए इंजन में कूलेंट लेवल सही रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि अगर कूलेंट की मात्रा कम होगी तो इंजन जल सकता है। इसलिए कूलेंट लेवल वॉर्निंग को देखते रहें। अगर आपकी कार के मीटर कंसोल में कूलेंट लेवल वॉर्निंग नहीं है तो हर 15-20 दिन में लेवल खुद चेक करें। और हमेशा अपनी कार में कूलेंट की बोतल साथ रखें।
टाइमिंग बेल्ट इंजन सबसे खास पार्ट है। टाइमिंग बेल्ट इस बात को सुनिश्चित करता है कि क्रैंकशाफ्ट और कैमशाफ्ट रोटेशन के बीच एक समानता बनी हुई है। लेकिन अगर तय समय पर इसको चेंज करना जरूरी है। क्योंकि अगर टाइमिंग बेल्ट ढीली हो जाती है या उसके दांत सपाट हो जाते हैं तो समझ जाएं कि टाइमिंग बेल्ट खराब हो चुकी है और इसके खराब होने से कार बंद हो जाती है।
इंजन ऑयल हर गाड़ी के इंजन की जान होता है। इंजन ऑयल को अगर सही समय न बदला जाए तो इंजन काम करना बंद कर देता है जोकि बेहद खतरनाक हो सकता है। इंजन ऑयल का लेवल कम होने से इंजन गर्म हो जाता है और कार बंद पड़ जाती है। इतना ही नहीं अगर ऑयल कम हो या काला पड़ जाए तो टॉप-अप कराना बेहद जरूरी है
जिस तरह एक घर की छत दिवारों पर टिकी है, उसी तरह एक कार भी टायर्स पर टिकी है। टायर्स में हवा उतनी ही डलवानी चाहिये जितनी कंपनी द्वारा बताई जाती है। कम हवा होने से इंजन पर दबाव पड़ता है। इसके अलावा टायर्स के थ्रेड की गहराई पर भी नजर रखनी चाहिए। अगर टायर गंजा हो जाए तो बदल लेना चाइये, लेकिन अगर आप गाड़ी ज्यादा नहीं चलाते और गाड़ी को 4 से 5 साल हो गये हैं तो गाड़ी के टायर्स चेंज करा देने चाहिये क्योंकि रबड़ सख्त हो जाती है और अपनी पकड़ खोने लगती है।