शनि की ढैया और साढ़े साती के विषय में सब जानते हैं, लेकिन शनि का एक और विशेष गोचर होता है, जिसे अष्टम शनि के नाम से जाना जाता है। अष्टम शनि तीस वर्ष में एक बार आता है और इसका स्पष्टीकरण जन्म कुंडली में इस प्रकार किया जाता है कि जब चंद्र की जन्म राशि से आठवें घर में गोचर का शनि आता है, तो अष्टम शनि आरंभ हो जाता है। चूंकि शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक रहते है, अतः अष्टम शनि की अवधि भी ढाई वर्ष की होती है।
किनकी कुंडली के अष्टम भाव में है शनि
जिन जातकों की जन्म कुंडली में चंद्र वृषभ राशि में है, तत्काल समय में उनका अष्टम शनि लागू है और ये जनवरी 2020 को समाप्त होगा I
अष्टम शनि के फल
अष्टम शनि के आरम्भ होने से मनुष्य को कुछ विशेष प्रकार के फल प्राप्त होते हैं, जिसमे कष्ट की भी प्रधानता होती है। ये बात विदित रहे की शनि एक कार्मिक ग्रह है और ये मनुष्य को सद्मार्ग और कर्म प्रधान मार्ग की ऒर अग्रसर करता है। अगर मनुष्य शनि के बताये हुए मार्ग पर अग्रसर न हो तो दंड का अधिकारी बनता है। अष्टम शनि के फल को समझना थोड़ा कठिन होता है, लेकिन कुछ विशेष घटनाओं का होना सामान्य बात होती है, इनमे से कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं निम्नलिखित हैं —
---पदच्युत हो जाना अर्थात् अपने पद को खो देना।
---निम्न कोटि के कार्यों में लिप्त हो जाना।
---निम्न कोटि के व्यक्तियों के संपर्क में आना और उनका आपको पथभ्रष्ट करना।
---विनाश काल विपरीत बुद्धि जैसे स्थिति बन जाना।
---वैरी को मित्र और मित्र को वैरी समझना।
---कोर्ट कचेहरी के मामलों में फस जाना।
---अक्खड़ बुद्धि हो जाना इत्यादि।
इनमे से किसी भी घटना का घट जाना ये संकेत देता है की आप शनि के दंड के अधिकारी बनने वाले हैं। ऐसे में तुरंत सावधान हो जाना चाहिए और कुमार्ग और दुष्कर्म को त्याग देना चाहिए। ऐसे समय में कुछ ऐसे कर्म में लिप्त हो जाना चाहिए, जिससे शनि समय अनुसार अपने दंड को कृपा में परिवर्तित कर दें। इस प्रकार किये जाने वाले कुछ कार्य/उपाय निम्न लिखित हैं —
---नित्य अपने माता पिता से आशीर्वाद लें।
---मजदूर वर्ग से प्रेम से पेश आयें और उनकी परेशानी में उनका साथ निभाएं।
---किसी जरूरतमंद की सहायता करें।
---शनिदेव के सिद्धस्थान जैसे श्री शनि शिंगणापुर में उनका दर्शन और पूजन करें।
---शनि प्रदोष पर श्री शिव रुद्राभिषेक करें।
---शनि अमावस्या पर सरसों के तेल, काला तिल, काली छतरी, काले जूते, काला तवा और चिमटे का दान करें।
---महामृत्युंजय मंत्र और दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करें।
---शनैश्चर कृत नरसिंह स्तुति का पाठ करना चाहिए।
---शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ में सरसों का तेल मिश्रित जल अर्पित करें।
---शनि अष्टोतर नाममाला का पाठ करें।
---कालभैरव अष्टकम् का रविवार के दिन पाठ करें।