ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को विशेष दर्जा प्राप्त है। यह शुभ ग्रहों में से एक है जो करीब 13 महीनों तक एक राशि में संचरण करते हैं। आपको बता दें कि धनु और मीन राशि के स्वामी ग्रह गुरु 19 अक्टूबर से अपनी उच्च राशि कर्क में हैं। गुरु के अतिचारी होने की वजह से इस वर्ष गुरू की चाल में तेजी है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में गुरु ग्रह का विशेष महत्व होता है। गुरु ग्रह को शुभ ग्रह माना जाता है और कुंडली में गुरु ग्रह की अच्छी स्थिति होने पर जातक के जीवन में किसी भी तरह की धन और मान-सम्मान की कोई भी कमी नहीं होती। आइए जानते हैं गुरु के कर्क राशि में संचरण करने से धनु राशि वालों पर प्रभाव।
धनु राशि के जातकों के लिए देवगुरु बृहस्पति पहले और चौथे भाव के स्वामी होकर अब आठवें भाव में संचरण करेंगे। देवगुरु बृहस्पति का आठवें भाव में गोचर को अच्छा नहीं माना जाता है। लग्न भाव के स्वामी का अष्टम भाव में गोचर से आपकी सेहत संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इस दौरान आपको कई तरह की मानसिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। इससे अलावा चौथे भाव के स्वामी का अष्टम भाव में जाना आपके लिए बड़ी चिंता का सबक हो सकता है। इस दौरान आपको किसी भी काम में जल्दबाजी से करने को बचना होगा। इस तरह के देवगुरु बृहस्पति का गोचर आपके लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है।
वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है।
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं।
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं।
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं।
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं।
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है।
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है।
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है।
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है।
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है।
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है।
- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है।
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।