धनु और मीन राशि के स्वामी ग्रह देवगुरु बृहस्पति अब अपनी उच्च अवस्था में कर्क राशि में संचरण कर रहे हैं। ज्योतिष में गुरु को बहुत ही शुभ ग्रहों में गिना जाता है। देवगुरु बृहस्पति एक राशि में करीब 13 महीनों तक गोचर करते हैं। आपको बता है कि देवगुरु इस वर्ष अतिचारी हुए हैं यानी गुरु अपनी सामान्य चाल से कई गुने की तेजी के साथ चल रहे हैं, जिससे गुरु एक वर्ष में तीन राशि का संचरण करेंगे। आइए जानते हैं देवगुरु बृहस्पति के कर्क राशि में गोचर करने से वृश्चिक राशि पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।
वृश्चिक राशि पर गुरु गोचर का प्रभाव
देवगुरु बृहस्पति वृश्चिक राशि के जातकों के लिए दूसरे और पंचम भाव के स्वामी होते हैं। 19 अक्तूबर को देवगुरु बृहस्पति का अतिचारी होकर मिथुन से कर्क राशि में गोचर आपके भाग्य भाव में हुआ है। ऐसे में आपको भाग्य का भरपूर साथ मिलेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार भाग्य भाव में देवगुरु का बृहस्पति का गोचर आपके लिए शुभ परिणाम देने वाला साबित होता है। ऐसे में लगातार जब तक देवगुरु कर्क राशि में रहेंगे आपको लगातार भाग्य का अच्छा साथ मिलता रहेगा। जिससे आपकी आर्थिक स्थिति में अच्छा इजाफा और लाभ के कई तरह के योग बनेंगे। इस दौरान आप कई तरह की धार्मिक यात्राएं होने के योग हैं । संतान के सुख की प्राप्त होगी। जो काम अधूरे हैं और अभी तक पूरे नहीं हो सके हैं वह पूरे हो सकते हैं। भाग्य भाव के स्वामी का उच्च का होना अच्छा आर्थिक लाभ दिलवान में सक्षम होता है। संतान से संबंधित मामलों में आपको अच्छे परिणामों की प्राप्ति होगी।
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वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है।
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं।
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं।
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं।
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं।
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है।
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है।
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है।
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है।
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है।
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है।
- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है।
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।