17 जनवरी 2021 से सभी ग्रहों में शुभ फल और विवाह के कारक माने जाने वाले गुरु ग्रह अस्त हो रहे हैं। इनके अस्त होते ही सभी तरह के मांगलिक कार्य थम जाएंगे। गुरु का अस्त होना ज्योतिष शास्त्र के नजरिए से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे पहले 7 जनवरी को कर्मफलदाता शनिदेव भी मकर राशि में अस्त हो चुके हैं। 16 फरवरी को शुक्र भी अस्त होंगे। गुरु और शुक्र दोनों ही ग्रह विवाह, सुख-संपन्नता और मांगलिक कार्यों का कारक ग्रह माने गए है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही कई दोनों से चल आ रहे खरमास भी खत्म हो गया है। शास्त्रों में खरमास को अशुभ माह माना गया है। इसमे किसी भी तरह के शुभ कार्य करना वर्जित होता है। गुरु ग्रह 16 फरवरी तक अस्त रहेंगे। इसी बीच शुक्र ग्रह के अस्त होने से मांगलिक कार्य रूके रहेंगे।
शुक्र ग्रह के अस्त की अवधि
जिस प्रकार गुरु तारा का उदय मांगलिक कार्यो के लिए महत्वपूर्ण है, उसी तरह शुक्र तारा का उदय भी सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों के महत्वपूर्ण माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार शुक्र तारा माघ शुक्ल तृतीया यानी 14 फरवरी 2021 से अस्त हो रहा है जो चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी यानी 18 अप्रैल 2021 को उदित होगा।
गुरु और शुक्र के अस्त होने की वजह से नींव पूजन, गृह प्रवेश, मुंडन, नए प्रतिष्ठान का शुभारंभ नहीं किया जाना चाहिए, परंतु बालक के जन्म लेने के बाद के सूतक आदि संस्कार, नामकरण,पूजन-हवन, कथा वाचन, सगाई समेत भूमि, वाहन, ज्वेलरी आदि की खरीद-फरोख्त की जा सकती है।
16 फरवरी को वसंत पंचमी पर अबूझ मुहूर्त,फिर विवाह नहीं हो सकेंगे
साल 2021 में वसंत पंचमी 16 फरवरी को है। शास्त्रों में इसे भी विवाह जैसे मांगलिक कार्य के लिए अबूझ मुहूर्त माना जाता है, लेकिन इस दिन सूर्योदय के साथ ही शुक्र तारा अस्त हो जाएगा। इस कारण इस दिन विवाह का योग नहीं बन रहा है।
ज्योतिष शास्त्र में अस्त ग्रह
साधारण शब्दों में जब कोई ग्रह कुछ विशेष अंशों के साथ सूर्य के निकट आ जाता है, तो उस ग्रह की चमक सूर्य के प्रकाश और तेज के सामने धीमी पड़ जाती है। इस कारण से वह आकाश में द्दष्टिगोचर नहीं होता तो उस ग्रह का अस्त होना कहलाता है।
“सूर्येणास्तम्भन सह”अर्थात सूर्य के साथ ( अधिक निकट आ जाना) अर्थात शुक्र का सूर्य से दूरी 9°या इससे कम हो जाना (यदि शुक्र वक्री चल रहा है तो वह सूर्य से 7 अंश या इससे अधिक समीप आये) ही शुक्र ग्रह अस्त कहलाता है। शुक्र अपनी गति से भ्रमण करते हुये जब सूर्य के सानिध्य में आते हैं तब उनका सूर्यकिरणों में निमग्न होने के कारण शुक्र दिखाई नहीं देते हैं। इसी घटना को शुक्र अस्त कहते हैं। इसी तरह जब वे सूर्य से दूर हट कर अर्थात सूर्य से शुक्र की दूरी 9°से अधिक हो जाए तो शुक्र दिखाई देने लगते हैं। इसे ही शुक्रोदय कहा जाता है। वहीं बृहस्पति 11 अंशों पर अस्त माना जाता है।
गुरु और शुक्र ग्रह का उदय और अस्त होना ज्योतिष और मुहूर्त की दृष्टी से बेहद महत्वपूर्ण है। गुरु और शुक्र का अनुकूल होना जातक के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। यही कारण है कि शुक्रास्त में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि शुक्र के बलहीन होने के कारण अच्छे परिणाम नहीं प्राप्त होते। शुक्र ग्रह पूर्व में अस्त होने के बाद 75 दिनों पश्चात पुन: उदित होता है। उदय के 240 दिन वक्री चलता है। इसके 23 दिन पश्चात अस्त हो जाता है। पश्चिम में अस्त होकर 9 दिन के पश्चात यह पुन: पूर्व दिशा में उदित होता है।