अब हम इन सूत्रों को एक उदाहरण कुंडली से समझते हैे। यह कुंडली एक ऐसे विद्वान की है जिन्होंने अपने ज्ञान से जीवन भर लोगों का भला किया। अगर इस कुंडली को देखें तो पंचमेश सूर्य और अष्टमेश मंगल दोनों छठे भाव में बैठ गए हैं। मंगल आठवें भाव का स्वामी होकर विपरीत राजयोग बना रहा है। वहीं गुरु बारहवें भाव के स्वामी होकर विपरीत राजयोग बना रहा है। उन दोनों भावेश के साथ पंचम भाव के स्वामी का आना साफ़ संकेत है कि व्यक्ति पिछले जन्म के कर्मों के कारण प्रसिद्द और विद्वान होगा।
लग्न में केतु, पंचम में बुध, बुध सूर्य का राशि परिवर्तन और गूढ़ विद्या का भाव यानी आठवें भाव के स्वामी का गुरु के साथ आना इस बात का संकेत है कि जातक उच्च कोटि का ज्ञानी होगा। अगर वाणी भाव के स्वामी जो देखें तो शुक्र सौम्य ग्रह चंद्र के साथ मूल त्रिकोण है और उस पर केतु का प्रभाव है। यही कारण है की उनकी वाणी कभी गलत साबित नहीं होती थी।
इस कुंडली में अगर शनि को देखें तो वो वृश्चिक राशि में आठवें भाव में विराजमान है जिसका स्वामी राजयोग में है। सिर्फ शनि एक ऐसा ग्रह है जिसे " कारको भाव नाशाय " का दोष नहीं लगता है। आठवें भाव का कारक उसी भाव में बैठकर स्थिर राशि में बैठे बुध को अपनी दृष्टि दे रहे हैं। बुध शनि की राशि को अपनी दृष्टि दे रहे है।
इस योग के कारण जातक की गणित और गणना करने की क्षमता अद्भुत हो जाती है। ऐसे में वह ज्योतिष गणनाओं में कोई गलती नहीं करता है। इस कुंडली को देखने पर साफ़ पता चलता है की गुरु, शनि, दूसरे भाव, पंचम भाव, अष्टम भाव कहीं ना कहीं एक-दूसरे के प्रभाव में आकर जातक को प्रसिद्ध ज्योतिषी बना रहे हैं।