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Year Ender 2025: ट्रंप की वापसी से लेकर नेपाल में ओली के तख्तापलट तक, दुनिया में 2025 के बड़े राजनीतिक बदलाव

Sat, 27 Dec 2025 07:10 AM IST
देवेश त्रिपाठी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला

सार

2025 में वैश्विक राजनीति में मची उथल-पुथल ने एक ओर लंबे समय से चली आ रही विश्व व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। वहीं, नई विश्व व्यवस्था अभी पूरी तरह से आकार भी नहीं ले पाई। यही अस्थिरता 2025 के राजनीति बदलावों की सबसे बड़ी पहचान बनी।
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2025 में दुनियाभर में हुए राजनीतिक बदलावों पर एक नजर। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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साल 2025 वैश्विक स्तर पर राजनीतिक बदलाव के साथ ही सियासी उथल-पुथल का वर्ष साबित हुआ है। जहां एक ओर सत्ता के पुराने केंद्र डगमगाए, वहीं दूसरी ओर वैश्विक सियासत में नए ध्रुवों ने आकार लिया। साल की शुरुआत पश्चिम में अमेरिका में लोकतांत्रिक तरीके से हुए सत्ता परिवर्तन से लेकर पूरब में जेन-Z प्रदर्शनकारियों के हिंसक प्रदर्शनों से नेपाल में हुए केपी शर्मा ओली के तख्तापलट तक तमाम सियासी बदलाव इसमें शामिल हैं। आइए 2025 में दुनियाभर में हुए तमाम बड़े राजनीतिक बदलावों पर एक नजर डालते हैं।

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अमेरिका में ट्रंप की वापसी से फैली दुनियाभर में बेचैनी
अमेरिका में हुए चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी भले ही दिसंबर, 2024 में तय हो गई थी, लेकिन आधिकारिक तौर पर जनवरी, 2025 में उन्होंने राष्ट्रपति के तौर पर सत्ता संभाली। ट्रंप 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (मागा) अभियान के दम पर सत्ता में वापस आए। राष्ट्रपति बनने के साथ ही डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर के देशों पर पारस्परिक टैरिफ लगाने का एलान किया। अमेरिका की ओर से लगाए गए इस टैरिफ की जद में मित्र देशों से लेकर प्रतिद्वंदी भी शामिल थे। इस पूरे साल में ट्रंप की ओर से कई देशों के आंतरिक मुद्दों में खुद को मुख्य सुलहकर्ता के तौर पर पेश किया गया। इनमें भारत और पाकिस्तान के बीच छिड़े युद्ध को कथित तौर पर रुकवाने का श्रेय लेना भी शामिल है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ की वजह से दुनिया में करीब आठ युद्ध उन्होंने रुकवा दिए। 

2025 में व्हाइट हाउस की ओर से लिए गए हर फैसले का असर यूक्रेन से लेकर ताइवान तक महसूस किया गया है। एच1-बी वीजा के शुल्क में बढ़ोतरी हो या यूक्रेन को हथियारों की मदद रोकने का एलान या फिर ताइवान को चीन से लोहा लेने के लिए हथियारों की खेप देने का फैसला, हर जगह ट्रंप की नीतियों ने सियासी उथल-पुथल को बढ़ावा दिया। ट्रंप ने अपने फैसलों से सहयोगियों पर दबाव बनाया और प्रतिद्वंद्वियों पर सख्ती बरती। हालांकि, तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था के चलते ट्रंप को चीन पर लगाया गया भारी-भरकम टैरिफ टालना पड़ा। आसान शब्दों में कहें तो ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका दुनिया का स्थिर स्तंभ नहीं, बल्कि एक अस्थिर धुरी बनता जा रहा है।
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ट्रूडो को छोड़नी पड़ी कुर्सी, वजह ट्रंप ही बने
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने जनवरी, 2025 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। ट्रूडो के सत्ता से बाहर होने की प्रमुख वजह उनकी पार्टी में हुई आंतरिक बगावत को माना जाता है। हालांकि, इसके सियासी परिदृश्य में कहीं न कहीं अमेरिकी सत्ता में ट्रंप की वापसी भी एक बड़ी वजह रही है। ट्रंप ने अमेरिकी चुनाव जीतने के बाद से ही जस्टिन ट्रूडो पर निशाना साधना शुरू कर दिया था। कभी ट्रंप कनाडा पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी देते तो कभी कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बताते हुए ट्रूडो को वहां का गवर्नर बताने लगते थे।

इतना ही नहीं जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे का श्रेय भी ट्रंप ने लिया। उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका के टैरिफ लगाने के दबाव के चलते ट्रूडो ने इस्तीफा दिया। दरअसल, ट्रंप के आगे ट्रूडो काफी कमजोर नजर आने लगे थे। उन्होंने ट्रंप की तमाम बयानबाजियों पर चुप्पी साधे रखी और इसी के चलते ट्रूडो की अपनी ही पार्टी में उनके खिलाफ बगावत शुरू हो गई। मंत्रियों के इस्तीफों से शुरू हुआ सिलसिला आखिर में ट्रूडो के इस्तीफे तक जा पहुंचा। ट्रूडो के इस्तीफे के बाद हुए चुनावों में मार्क कार्नी की लिबरल पार्टी को जीत मिली और उन्होंने पीएम पद संभाला।

फ्रेडरिक मर्ज बने जर्मनी के नए चांसलर, ओलाफ स्कोल्ज को दी पटखनी
फरवरी, 2025 में जर्मनी की सत्ता में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला। जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कोल्ज सत्ता से बाहर हो गए और फ्रेडरिक मर्ज नए चांसलर बने। जर्मन राजनीति में उन्हें बुंडेस्टैग में जरूरी बहुमत हासिल करने के लिए दूसरे मतदान की आवश्यकता पड़ी। इसके बाद फ्रेडरिक मर्ज की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू), क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू ) और सोशल डेमोक्रेट्स (एसपीडी)  ने जर्मनी की नई सरकार के रूप में काम शुरू किया। चौंकाने वाली बात थी कि 69 वर्षीय मर्ज ने कभी भी महत्वपूर्ण नेतृत्व जिम्मेदारियों वाला कोई शीर्ष सरकारी पद नहीं संभाला था। वे किसी छोटे शहर के मेयर तक नहीं रहे हैं। 

कहा जा सकता है कि जर्मनी में चांसलर ओलाफ स्कोल्ज के सत्ता से बाहर होने की जमीन डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनकी नीतियों से तैयार हुई। ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति, नाटो को लेकर सख्त रुख और यूरोप से सुरक्षा खर्च बढ़ाने की मांग ने जर्मन राजनीति पर दबाव बढ़ाया। स्कोलज की सरकार पहले से ही आर्थिक मंदी, ऊर्जा संकट और यूक्रेन युद्ध को लेकर घरेलू आलोचना झेल रही थी। ट्रंप की ओर से रूस के लिए नरम रुख और यूक्रेन को समर्थन घटाने के संकेतों ने जर्मनी में सुरक्षा को लेकर चिंता गहरा दी। इसके चलते जर्मन मतदाताओं और सियासी दलों में स्कोल्ज सरकार पर बदलते वैश्विक हालात में देश के हितों की रक्षा कर पाने को लेकर सवाल खड़े होने लगे।

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दक्षिण कोरिया: ली जे म्युंग बने राष्ट्रपति, महाभियोग के बाद हटाए गए यून सुक योल
इस साल दक्षिण कोरिया की राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। पूर्व राष्ट्रपति यून सुक योल को मार्शल लॉ लगाने के चलते महाभियोग का सामना करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया। इसके बाद ली जे-म्युंग ने देश के नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। यून सुक योल के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती गई। संसद में विपक्षी दलों ने बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित किया और सोल को राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ा। 
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थाईलैंड में सत्ता से बाहर हुआ शिनवात्रा परिवार, अनुतिन चार्नवीरकुल बने पीएम
सितंबर, 2025 में शिनावात्रा परिवार की तीसरी पीढ़ी की नेता पेइतोंग्तर्न शिनावात्रा को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा। देश के नए प्रधानमंत्री के तौर पर अनुतिन चार्नवीरकुल को चुना गया। जुलाई, 2025 में थाईलैंड-कंबोडिया सीमा पर छिड़ी भीषण लड़ाई के बाद थाईलैंड की पूर्व पीएम पेइतोंग्तर्न शिनावात्रा का एक फोन कॉल लीक हुआ। इसमें वह थाईलैंड की सेना की आलोचना करती सुनाई दे रही थीं। इसके बाद से ही उन पर पद को छोड़ने का दबाव बढ़ने लगा था। थाईलैंड की संवैधानिक अदालत ने पेइतोंग्तर्न को उनके पद से निलंबित कर दिया।

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सोशल मीडिया पर बैन से नेपाल में केपी ओली का तख्तापलट
सितंबर, 2025 में नेपाल में केपी शर्मा ओली की सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का एलान किया। इसकी वजह से जेन-Z युवाओं का गुस्सा भड़क उठा। हालांकि, केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों की अकेली वजह सोशल मीडिया पर प्रतिबंध नहीं, देश की सत्ता पर बुजुर्ग नेताओं का कब्जा और भ्रष्टाचार के आरोप भी कारण रहे। इन हिंसक विरोध प्रदर्शनों की वजह से प्रधानमंत्री ओली को इस्तीफा देना पड़ा। फिलहाल नेपाल में पूर्व सीजेआई सुशीला कार्की के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी है। इस अंतरिम सरकार ने नेपाल में 2026 के मार्च महीने में आम चुनाव कराने का फैसला लिया है। इस बीच देश में राजशाही की वापसी की मांग भी जोर पकड़ रही है। हालांकि, इसकी संभावना कम ही है।

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