पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (फाइल फोटो)
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पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की गति धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इस बात की पुष्टि इस खबर से होती है कि पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में श्रीकृष्ण के मंदिर के निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गई थी। इस मंदिर से तीन हजार पाकिस्तानी हिंदू श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना करने के लिए एक नया और पहला धार्मिक स्थल मिल जाता है लेकिन पाकिस्तानी प्रशासन की ओर से उस पर रोक लगा दी गई।
ऐसा पहली बार नहीं है, इससे पहले भी इस्लामाबाद के सैदपुर गांव में स्थित एक राम मंदिर में श्रद्धालुओं के पूजा-अर्चना करने पर भी रोक लगा दी थी। ये मंदिर 16वीं सदी में बनाया गया था। ऑल पाकिस्तान हिंदू राइट्स मूवमेंट के एक सर्वे के अनुसार 1947 में बंटवारे के समय पाकिस्तान में 428 मंदिर थे लेकिन 1990 के दशक के बाद 408 मंदिरों में खिलौने की दुकानें, रेस्त्रां, होटल, सरकारी स्कूल औऱ मदरसे खुल गए।
हालांकि इसी बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से सौहार्द का प्रदर्शन किया गया। इमरान खान की सरकार ने इस मंदिर के निर्माण के लिए दस करोड़ रुपये देने का एलान किया लेकिन इस फैसले पर राजनैतिक और धार्मिक समूहों ने विरोध किया।
इधर जामिया अशरफिया मदरसे की ओर से शरिया कानून का हवाला देते हुए यह कहा गया कि गैर-मुस्लिमों के लिए प्रार्थना के लिए नई जगह पर निर्माण की इजाजत नहीं दी जा सकती है। इस्लामिक देश में ऐसा करना पाप है।
वहीं पाकिस्तान के पंजाब विधानसभा के स्पीकर चौधरी परवेज इलाही ने कहा कि हिंंदू, सिख और ईसाईयों की धर्मस्थल पर सिर्फ मरम्मत की इजाजत दी जा सकती है। नए मंदिर, गुरुद्वारे या गिरिजा घरों के निर्माण की इजाजत देना इस्लाम की आत्मा के खिलाफ है।
पाकिस्तान में बना करतारपुर कॉरिडोर सरकारी पैसों से बना है लेकिन राष्ट्रीय हित होने की वजह से ना ही उस पर कोई राजनैतिक दवाब देखा गया और ना ही कोई धार्मिक विरोध। ये आश्चर्य की बात है कि मंदिर निर्माण पर धार्मिक विरोध होने से पहले ही शहर के नगर निगम प्रशासन ने निर्माण कार्य पर रोक लगा दी थी।