आज दुनिया में युद्ध लड़ने का तरीका बदल चुका है। पहले युद्ध लड़ने के लिए तीर-तलवार का प्रयोग किया जाता था, फिर उसकी जगह बंदूकों और तोपों ने ले ली। लेकिन वर्तमान समय में युद्ध को मिसाइलों और रॉकेटों के जरिए लड़ा जा रहा है। हर देश तरह-तरह की मिसाइलों को अपने हथियारों के जखीरे में जमा कर रहे हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर दुश्मन के दांत खट्टे किए जा सकें।
लेकिन सवाल यह है कि, दुनिया में मिसाइल और रॉकेटों द्वारा युद्ध लड़ने का ख्याल किस देश को पहले आया। दरअसल, जर्मनी वो देश है, जिसने दुनिया में सबसे पहले युद्ध में मिसाइलों का इस्तेमाल करने के बारे में सोचा था।
वर्तमान में रूस और अमेरिका ने जर्मनी को मिसाइलों की दौड़ में बहुत पीछे छोड़ दिया है, लेकिन मिसाइलों की इस होड़ की शुरुआत जर्मनी ने ही की थी। बाद में जर्मन वैज्ञानिकों ने रूस और अमेरिका में मिसाइलों के निर्माण में अहम रोल अदा किया।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के एक गांव को मिसाइल फैक्टरी के तौर पर विकसित किया गया। जर्मनी के यूसडम द्वीप में पेन नदी के मुहाने पर स्थित पेनमुंडे गांव में मिसाइलों को तैयार करने का काम शुरु हुआ। पेन नदी, यहां पर आकर बाल्टिक सागर में गिरती है। नाजी सरकार ने 1936 से 1945 तक पेनमुंडे गांव को अपने बेहद खुफिया मिशन का अड्डा बनाया था।
इस तरह तैयार हुई पहली क्रूज मिसाइल बनाने की फैक्टरी
जर्मन इजीनियर वर्नहर वॉन ब्रॉन ने 1935 में पेनमुंडे गांव को अपने मिसाइल कारखाने के लिए चुना था। उन्होंने इस गांव को इसलिए चुना क्योंकि यहां के आसपास का चार सौ किलोमीटर का इलाका बिल्कुल सुनसान था।
ब्रॉन ने इस जगह को अपने रॉकेट परीक्षणों के लिए बिल्कुल सही पाया। जल्द ही नाजी सरकार ने यहां मिसाइल का कारखाना और टेस्टिंग रेंज स्थापित करने की इजाजत दे दी। इसके बाद यहां तेजी से काम शुरू किया गया। यहां 12 हजार लोगों ने दिन-रात काम करके दुनिया की पहली क्रूज मिसाइल बनाने की फैक्टरी और टेस्टिंग रेंज को स्थापित किया।
रॉकेट तकनीक से ही इंसान ने अंतरिक्ष का सफर शुरू किया
क्रूज मिसाइल बनाने की यह फैक्टरी 25 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली थी। इस गांव में होने वाले मिसाइल टेस्ट ने दुनिया के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत की। पेनमुंडे गांव में ही रॉकेट तकनीक की बुनियाद रखी गई, जिसकी मदद से आगे चलकर इंसान ने अंतरिक्ष का सफर शुरू किया।
वर्तमान समय में यह गांव बिल्कुल उजाड़ हो चुका है। यहां बस एक लाल रंग का पॉवर स्टेशन ही बचा है, जिसमें पेनमुंडे हिस्टोरिकल टेक्निकल म्यूजियम स्थापित किया गया है। पूरे इलाके में रॉकेट के टुकड़े, पतवार, इंजन और दूसरे सामान बिखरे हुए हैं।