‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानी पूरा विश्व एक परिवार है। भारतीय संस्कृति के इस सूत्रवाक्य ने हर समय दुनिया के सामने अपनी छाप छोड़ी है। आज विश्व परिवार दिवस के मौके पर हम आपको ऐसे ही एक भारतीय परिवार की कहानी बताने जा रहे हैं, जो सात समुंदर पार जाकर भी अपने देश की संस्कृति को नहीं भुला है। कोरोना महामारी के इस दौर में जब हर कोई अपनी जान बचाने की जुगत में लगा है, उस समय अमेरिका में रहने वाला यह भारतीय परिवार डिजिटल माध्यम से 24 घंटे मुफ्त में लोगों को चिकित्सकीय परामर्श दे रहा है। इस परिवार में 10 सदस्य हैं, जिनमें से ज्यादातर लोग डॉक्टर हैं। इन डॉक्टरों का कहना है कि ‘परिवार’ हमें सेवाभाव सिखाता है, इस विकट की घड़ी में हम अपनों को अकेला नहीं छोड़ सकते।
सैकड़ों मरीजों को मिल रहा लाभ
पेशे से एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. डॉली रानी अमेरिका के इंडियानापोलिस राज्य में अपने परिवार के साथ रहती हैं। वह और डॉक्टरों का उनका पूरा परिवार फिलहाल चौबीसों घंटे वीडियो चैट्स, फोन कॉल्स और व्हाट्सएप के जरिये कोरोना काल में लोगों को चिकित्सा संबंधी सलाह दे रहा है। इस परिवार की कोशिशों के चलते भारत के सैकड़ों मरीजों को लाभ मिल रहा है।
डॉक्टर रानी का कहना है कि परिवार के सभी लोग कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ दे रहे हैं। डॉ. रानी भारत से आने वाले प्रत्येक फोन कॉल या मैसेज पर लोगों को दवा, मरीज की स्थिति, बीमारी के लक्षण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का हल बताती रहती हैं। उन्होंने कहा कि सबसे मुश्किल काम मरीजों का हौसला बढ़ाना और उनमें जीवन जीने की इच्छा को बनाए रखना होता है।
भारत भेजे 600 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर
उन्होंने आगे कहा, 'सेवाभाव परिवार से ही पैदा होता है, इसलिए अपनों को अकेला नहीं छोड़ सकते। हार न माने, हिम्मत रखें, आप जल्द स्वस्थ्य हो जाएंगे।’ इतना ही नहीं डॉक्टर रानी ने बताया है कि उनके परिवार ने भारतीय प्रशासन और मेडिकल एसोसिएशन की मदद से 600 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर भारत भिजवाए हैं। उन्होंने कहा कि भारत से इन दिनों सबसे ज्यादा फोन आ रहे हैं। आधी रात को भी परामर्श के लिए लोगों का कॉल आता है। लगभग भारत के हर राज्य से हमें कॉल आ रहे हैं।
डॉ. रानी कहती हैं कि ‘कई खबरें मुझे विचलित कर देती हैं। अब तो व्हाट्सएप खोलने में भी डर लगता है कि पता नहीं आज क्या खबर मिलेगी लेकिन यह तो युद्ध काल है।’ इधर, दिल्ली में रहने वाली डॉक्टर रानी की बहन डॉ. डेजी रानी ने कहा, ‘बेशक हम पर काम का ज्यादा दबाव है, लेकिन जब हमें अपनों को खोना पड़ता है तो बहुत बुरा लगता है पर क्या करें हमें काम पर तो जाना ही होता है ताकि हम दूसरी और जिंदगियों को बचा सकें।’