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यूएन में भारत ने क्यों जताई नाराजगी?: मानवाधिकार रिपोर्ट को लेकर उठाए सवाल, पूछा- एक जैसा पैमाना क्यों नहीं?

Wed, 14 Oct 2026 10:15 AM IST
प्रशांत तिवारी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला

सार

भारत ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्थाओं से राजनीतिक पक्षपात और दोहरे मापदंडों से बचने की अपील की है। दिल्ली में प्रदर्शनों पर संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी को भारत ने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया। साथ ही, आदिवासी अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में वन अधिकार अधिनियम के तहत दावे लंबित होने संबंधी निष्कर्ष पर सवाल उठाते हुए सरकारी आंकड़े पेश किए। 

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अनुज स्वरूप, यूएन में स्थायी मिशन के प्रथम सचिव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति के 81वें सत्र में सोमवार को भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार तंत्र से साफ कहा है कि उसे किसी भी तरह के राजनीतिक प्रभाव और पक्षपात से दूर रहकर काम करना चाहिए। साथ ही, मानवाधिकारों से जुड़े मामलों का आकलन करते समय अलग-अलग देशों की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। भारत ने अपने बयान में दोहराया कि वह बिना किसी भेदभाव और दोहरे मापदंड के सभी लोगों के मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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क्यों आयोजित किया गया था यह सत्र
भारत की ओर से स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनुज स्वरूप ने यह बयान दिया। यह सत्र मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर चर्चा के लिए आयोजित किया गया था। स्वरूप ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त और उनके कार्यालय के साथ भरोसे और साझेदारी की भावना से काम करता रहेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्थाएं राजनीतिक खींचतान और चुनिंदा मामलों पर ध्यान देने की प्रवृत्ति से ऊपर उठेंगी। उनके मुताबिक, इन संस्थाओं को दुनिया के लिए एक निष्पक्ष नैतिक मार्गदर्शक की तरह काम करना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि वे हर देश की परिस्थितियों को समझें और मानवाधिकारों के मुद्दे पर सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करें।

दिल्ली में प्रदर्शनों पर टिप्पणी से बढ़ा विवाद
भारत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब कुछ दिन पहले नई दिल्ली में हुए प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय की टिप्पणी पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी। भारत ने इस टिप्पणी को अनुचित बताते हुए देश के आंतरिक मामलों में अस्वीकार्य हस्तक्षेप करार दिया था। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान प्रदर्शनकारियों, आंदोलन के नेताओं, नागरिक समाज संगठनों के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरों पर चिंता जताई थी। इसके बाद भारत ने अपनी संप्रभुता और आंतरिक मामलों से जुड़े मुद्दों पर बाहरी टिप्पणियों को लेकर नाराजगी जाहिर की।
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भारत ने लोकतंत्र और सामाजिक विकास का दिया हवाला
अनुज स्वरूप ने कहा कि भारत में मानवाधिकारों की सोच उसकी सभ्यतागत परंपराओं, विविधता को स्वीकार करने और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार परिषद के सदस्य के रूप में भारत ने हमेशा संवाद और सहयोग के जरिए रचनात्मक भूमिका निभाने की कोशिश की है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत हर नागरिक की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। स्वरूप ने देश में गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति का भी उल्लेख किया।

पिछले एक दशक में 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए
उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में 25 करोड़ से अधिक लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए हैं। भारत की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ एक अरब से ज्यादा लोगों तक पहुंच रहा है। करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है, जबकि लगभग 60 करोड़ लोगों को मुफ्त स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है। इसके अलावा, महिलाओं के नाम पर 32 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं। भारत ने इन पहलों को लोगों को केंद्र में रखकर किए जा रहे विकास के अपने मॉडल का हिस्सा बताया। स्वरूप ने कहा कि भारत सभी के मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है और मानवाधिकार परिषद को प्रभावी, निष्पक्ष तथा विश्वसनीय संस्था बनाने के लिए सभी सदस्य देशों के साथ काम करता रहेगा।

2027-2029 के लिए 15 देश मानवाधिकार परिषद में चुने गए
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मंगलवार को मानवाधिकार परिषद के लिए 2027 से 2029 तक के कार्यकाल के लिए 15 देशों का चुनाव किया। इनमें ब्राजील, बुरुंडी, डोमिनिकन गणराज्य, जर्मनी, घाना, आयरलैंड, जापान, जॉर्डन, कुवैत, नेपाल, नाइजीरिया, मोल्दोवा गणराज्य, यूक्रेन, उरुग्वे और जाम्बिया शामिल हैं। मानवाधिकार परिषद संयुक्त राष्ट्र की एक प्रमुख संस्था है, जो दुनिया भर में मानवाधिकारों के संरक्षण और उल्लंघन से जुड़े मामलों पर काम करती है। भारत ने अपने बयान में इस संस्था को अधिक निष्पक्ष और भरोसेमंद बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

आदिवासी अधिकारों पर UN की रिपोर्ट को भी भारत की चुनौती
भारत ने आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की एक अन्य रिपोर्ट में देश का उल्लेख किए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई। यह रिपोर्ट आदिवासी लोगों की जमीन, क्षेत्रों और प्राकृतिक संसाधनों के सीमांकन, पंजीकरण और कानूनी अधिकारों से संबंधित है। इसे आदिवासी लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक अल्बर्ट बारूमे ने तैयार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में वन अधिकार अधिनियम के तहत लाखों दावे जमा किए गए हैं, लेकिन बड़ी संख्या में दावे अब भी लंबित हैं। इसमें खास तौर पर सामुदायिक अधिकारों से जुड़े दावों का जिक्र किया गया है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अनुज स्वरूप ने रिपोर्ट के अनुच्छेद 42 में भारत के संदर्भ को निराधार बताया। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि वन अधिकार अधिनियम व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों को मान्यता देता है, लेकिन दावों के लंबित रहने को लेकर किया गया दावा केवल एक व्यक्ति की ओर से दी गई जानकारी पर आधारित है। भारत ने सवाल उठाया कि जब इस दावे के समर्थन में कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, तो इसे रिपोर्ट में किस आधार पर शामिल किया गया। स्वरूप के अनुसार, सत्यापन के बिना मिली जानकारी पर निर्भर रहना रिपोर्ट की गंभीरता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।

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वन अधिकार कानून के आंकड़े रखे, रिपोर्ट में सुधार की पेशकश
भारत ने इस मामले में सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वन अधिकार अधिनियम के तहत 54 लाख से अधिक दावे दाखिल किए गए हैं। इनमें से 80 प्रतिशत से ज्यादा दावों पर फैसला हो चुका है और 25 लाख से अधिक अधिकार पत्र बांटे जा चुके हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक को नए और अद्यतन आंकड़े उपलब्ध कराने की पेशकश भी की, ताकि अपुष्ट जानकारी के आधार पर रिपोर्ट में शामिल की गई गलतियों या विसंगतियों को सुधारा जा सके। भारत ने अंत में कहा कि वह ऐसे सतत और समग्र विकास के लिए प्रतिबद्ध है, जिसमें कोई भी समुदाय पीछे न छूटे। देश ने आदिवासी लोगों के अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति अपने समर्थन को भी दोहराया। भारत का स्पष्ट संदेश है कि मानवाधिकारों के मुद्दे पर किसी भी देश का आकलन करते समय निष्पक्षता, विश्वसनीय आंकड़ों और सभी पक्षों के साथ समान व्यवहार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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