1971 में पाकिस्तान से आजाद होने के बाद बांग्लादेश शेख मुजीब उर रहमान के नेतृत्व में तेजी से आगे बढ़ रहा था। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मुजीब उर रहमान की नजदीकी दोस्ती थी। उस समय शेख मुजीब उर रहमान ने नेशनलाइजेशन पर खासा जोर दिया। राष्ट्रपति होने के नाते उनका सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रीय राजनीति पर था लेकिन धीरे-धीरे उनके खिलाफ गुस्सा बढ़ने लगा।
मुजीब पर भाई-भतीजावाद के आरोप लगने लगे। चार साल बीतते बीतते मुजीब उर रहमान के खिलाफ अलग-अलग धड़ों में गुस्सा पनपने लगा। इसमें सेना के कुछ अधिकारी भी शामिल थे।
15 अगस्त 1975 को हुई हत्या
15 अगस्त 1975 को बांग्लादेश सेना के कुछ जूनियर अधिकारियों ने राष्ट्रपति भवन पर टैंक लेकर हमला कर दिया। इस हमले में शेख मुजीब उर रहमान समेत उनका परिवार और स्टाफ मारे गए। उनकी सिर्फ दो बेटियां शेख हसीना और शेख रेहाना की जान बच गई थी क्योंकि वो उस समय जर्मनी घूमने के लिए गई हुई थीं।
मुजीब की मौत के बाद बांग्लादेश में हिंसा का दौर चला। ये दौर करीब दो सालों तक चला। इसके बाद अपने पिता की खोई हुई विरासत को वापस लेने के लिए शेख हसीना ने लंबी राजनैतिक लड़ाई लड़ी और 1996 में वो बांग्लादेश की प्रधानमंत्री चुनी गईं।