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आखिरी सफेद गैंडे के बाद कौन-कौन हैं खतरे में?

Fri, 23 Mar 2018 01:52 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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इसी सप्ताह कीनिया में दुर्लभ नस्ल के आखिरी सफेद गैंडे की मौत के बाद गैंडे की इस प्रजाति को विलुप्त घोषित कर दिया गया है। वैज्ञानिकों को एक आखिरी उम्मीद आईवीएफ (टेस्ट ट्यूब) तकनीक से है जिसकी मदद से आने वाले वक्त में 'सूडान' नाम के इस गैंडे के बच्चों को जन्म दिया जा सकता है। वर्ल्ड वाइल्ड फंड फॉर नेचर (WWF) में संरक्षण अभियानों के प्रमुख कॉलिन बटफील्ड के अनुसार ये एक बुरी स्थिति है। साल 1958 में वैक्विटा नाम की एक बड़ी समुद्री मछली की खोज हुई थी और उसके बाद जावन नस्ल के गैंडों की, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वो भी अब विलुप्त होने की कगार पर हैं।

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ऐसे ही सुमात्रा में पाए जाने वाले गैंडे, काले गैंडे, अमूर तेंदुए, जंगली हाथी और बोर्नियो के ऑरंगुटैन कुछ ऐसी प्रजातियों में शामिल हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे विलुप्तप्राय हैं या उनकी संख्या 100 से भी कम रह गई है। प्रकृति के संरक्षण के लिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय संघ (IUCN) ने ऐसे जानवरों की सूची जारी की है जिन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

खतरे में शामिल नई प्रजातियां

इस लिस्ट के मुताबिक, 5,583 ऐसी प्रजातियां हैं जिन्हें बचाने के लिए गंभीर रूप के काम किए जाने की जरूरत है। कम से कम 26 ऐसी नई प्रजातियां हैं जिन्हें साल 2017 में इस लिस्ट में शामिल किया गया। ये प्रजातियां एक साल पहले तक खतरे के निशान से ऊपर थीं। साल 2016 में IUCN ने एक अनुमान के तहत बताया था कि अब सिर्फ 30 वैक्विटा मछलियां बची हैं और हो सकता है कि अगले एक दशक में ये प्रजाति विलुप्त हो जाए। जमीन पर पाए जाने वाले स्तनधारियों की गिनती करना आसान होता है। इसके लिए संस्थाएं जीपीएस ट्रैकर, कई किस्म के कैमरे, कंकालों की गिनती, पंजों के निशान और पेड़ों पर लगी खरोंचों का इस्तेमाल करती हैं।
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फिर भी पशुओं की गिनती को लेकर हमेशा विवाद रहता है। हर साल नई प्रजातियों की भी खोज होती है। भले ही ये नई प्रजातियां दुनिया भर में जानवरों की गिनत में जुड़ जाती हैं। लेकिन ये सच है कि जानवर बेहद तेजी से खत्म हो रहे हैं। साथ ही ये एक बड़ी समस्या है कि विलुप्त होते जानवरों के बारे में एकदम सही आंकड़े जुटा पाना मुश्किल है।

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ऐसे पता चलता है कि कौन सी प्रजाति है लुप्त होने की कगार पर

नंबर कितने भरोसेमंद?

पशु सरक्षंण के लिए अभियान चलाने वाले कहते हैं कि ऐसी भी कई प्रजातियां हैं जिनके बारे में कहा गया कि वे विलुप्त हो चुकी हैं, लेकिन बाद में उनकी मौजूदगी दर्ज की गई। जैसे ब्राजील में होने वाला खास किस्म का नीला तोता जिसके विलुप्त होने की घोषणा कर दी गई थी। लेकिन साल 2016 में उस नस्ल के एक तोते को देखा गया। इसीलिए कई वैज्ञानिकों का कहना है कि जब किसी जीव के विलुप्त होने के खतरे की बात हो तो सिर्फ नंबरों को देखना ठीक नहीं।

कैसे तय होता है कि कोई प्रजाति विलुप्त होने के खतरे में है?

- एक नस्ल के सभी जीव जब एक जगह रहने लगें। ऐसे में माना जाता है कि किसी एक बीमारी या आपदा के कारण सभी की मौत हो सकती है।
- देखा जाता है कि भौगोलिक रूप से कोई प्रजाति कितने बड़े इलाके में फैली है।
- उनका प्रजनन चक्र कितना लंबा है? और क्या वो जोड़े में बच्चों को जन्म देते हैं या एक बार में एक ही बच्चा देने की क्षमता है।
- वो किस तरह के खतरों का सामना कर रहे हैं?
- क्या उस नस्ल की जनसंख्या में आनुवंशिक रूप से विविधता है?
- उनका आवास किस तरह के खतरे में है और कितने खतरे में है?

आप सरल शब्दों में इसे ऐसे समझ सकते हैं कि किसी एक नस्ल के सिर्फ पांच सौ जानवर बचे हैं और वहीं दूसरी किसी नस्ल के सिर्फ तीन सौ। लेकिन तीन सौ जानवर अगर बड़े भौगोलिक इलाके में फैले हैं और पांच सौ किसी एक छोटी जगह तक सीमित हैं, तो पांच सौ जानवरों वाली नस्ल को पहले विलुप्तप्राय घोषित किया जाएगा। उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में रहने वाली नस्लों और तेज गर्मी वाले जंगलों में रहने वाली नस्लों के बीच तुलना की जाती है।
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