चीन ने मजबूत किए हैं सऊदी और ईरान के साथ आर्थिक संबंध
विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में ये धारणा हाल के वर्षों में गहराई है कि ये इलाका अमेरिका की प्राथमिकता नहीं रहा। इस क्षेत्र से अमेरिकी वापसी की वजह से यहां चीन के अनुकूल स्थितियां बनी हैं। एक समय सऊदी अरब जैसे देश कम्युनिस्ट विचारधारा के कारण चीन से दूरी बनाए रखते थे। लेकिन अब वहां भी चीनी कंपनियां अपने पांव फैला रही हैं। चीन ने अपनी योजनाबद्ध रणनीति के तहत सउदी अरब और ईरान, दोनों देशों से ही अपने आर्थिक रिश्ते मजबूत किए हैं, जबकि इन दोनों देशों के बीच तीखे आपसी टकराव की स्थिति है।
अमेरिकी थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में सीनियर फेलो जोनाथन फुल्टन ने सीएनएन से कहा, ‘आपके सामने ऐसी सूरत है कि एक प्रमुख विश्व शक्ति उस क्षेत्र से जा रही है। तो सामने चीन है, जो इस इलाके का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन कर उभरा है।’ विश्लेषकों का कहना है कि लेकिन अब अमेरिका ने एक बार फिर इस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया है। उससे इस देश के सामने अमेरिका या चीन के बीच से किसी एक को चुनने की समस्या पेश आ रही है।
चीन के आकर्षक पेशकशों का अमेरिका नहीं दे पा रहा विकल्प
फुल्टन के मुताबिक ये क्षेत्र चीन की तरफ इसलिए झुकता दिख रहा है क्योंकि वह जो आकर्षक सौदे सामने रखता है, अमेरिका के पास उसका कोई जवाब नहीं है। मसलन, अमेरिका यह तो चाहता है कि यूएई हुवावे से संबंध न रखे, लेकिन इसके बदले वह कोई विकल्प पेश नहीं करता। जानकारों के मुताबिक ऐसा ही लेबनान में हुआ, जहां की सरकार ने चीनी निवेश को इजाजत दी है। अमेरिका ने लेबनान को चीन के कर्ज जाल में फंसने की चेतावनी दी, लेकिन उसने यह नहीं बताया है कि लेबनान अपने कमजोर पड़ते इन्फ्रास्ट्रक्चर को कैसे संभाले।
ब्रिटिश थिंक टैंक चैटहैम हाउस में एसोसिएट फेलॉ हिनेन एल कादी ने कहा है, ‘हाल के वर्षों में अमेरिकी दबाव बढ़ गया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आप तभी देशों पर दबाव डाल सकते हैं अगर आपके पास बेहतर डील देने की क्षमता हो।’ फुल्टन ने कहा है कि सिर्फ तानाशाही व्यवस्था का भय दिखाना कारगर साबित नहीं हुआ है।