एशिया टाइम्स की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक म्यांमार का उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र सगायंग पीडीएफ की गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। ये इलाका परंपरागत रूप से लोकतंत्र के लिए संघर्ष की प्रतीक समझी जाने वाली नेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) का गढ़ रहा है। खबरों के मुताबिक सगायंग और पास के मेगवे क्षेत्र में पीडीएफ की गतिविधियां सबसे तेज रही हैं।
बीते नवंबर में इन्हीं इलाकों में सैनिक शासकों ने अपना ‘उग्रवाद विरोधी’ विशेष अभियान शुरू किया। ‘अलौंग मिन ताया’ नाम के इस अभियान के दौरान अंधाधुंध छापे मारे गए हैं और कई जगहों पर हवाई बमबारी की गई है। लेकिन जानकारों का कहना है कि ये सख्त कार्रवाई भी विद्रोहियों का मनोबल तोड़ने में नाकाम रही है। वैसे जानकारों का यह भी कहना है कि पीडीएफ के सामने इस समय मुश्किल चुनौतियां हैं।
पीडीएफ की पहली बड़ी मुश्किल यह है कि उसके पास आधुनिक हथियारों की कमी है। पीडीएफ मोटे तौर पर आम राइफलों और ऑटोमैटिक हथियारों से हमले करता रहा है। हथियार जुटाने में उसे म्यांमार के सीमाई इलाकों में बसे नस्लीय अल्पसंख्यक समुदायों से मदद मिलती रही है। पीडीएफ हिट एंड रन तरीके से हमले करता रहा है। लेकिन जो हथियार उसके पास हैं, उनसे म्यांमार की सेना का मुकाबला करना कठिन है, क्योंकि सेना के पास अत्याधुनिक हथियार है।
इसीलिए विश्लेषकों का कहना है कि सैनिक शासन विरोधी संघर्ष अगले साल कहां पहुंचेगा, यह काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि खुद को म्यांमार की वैकल्पिक सरकार के तौर पर पेश करने वाले एनयूजी (नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट) और पीडीएफ में कितना तालमेल बन पाता है। अगर ये संबंध कमजोर रहा, तो पीडीएफ छिटपुट हमले करने तक सीमित रहेगा। उस हाल में सैनिक शासकों उसका आसानी से दमन करने की स्थिति में होंगे।