अमेरिका राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन के अगले 11 सितंबर से पहले अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी के फैसले पर यहां सावधानी भरी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। इस बार के अमेरिकी एलान में ये खास है कि वापसी की बात बिना शर्त कही गई है। यानी अफगानिस्तान में उस समय तक चाहे जो परिस्थितियां हों, अमेरिका अपनी फौज वापस बुला लेगा। फिर भी ऐसा सचमुच हो पाएगा, इसको लेकर यहां शक है।
इसकी वजह यह है कि सैनिक वापसी की तैयारी में अमेरिका ने जो ‘शांति प्रक्रिया’ तय की है, उसमें नए पेच पड़ गए हैं। मंगलवार को ये खबर आई कि राष्ट्रपति बाइडन 11 सितंबर के प्रतीकात्मक महत्त्व (इसी तारीख को अमेरिका पर आतंकवादी हमले हुए थे) को देखते हुए उस तारीख को पूरी सैनिक वापसी की नई समयसीमा घोषित करेंगे। उसके कुछ ही देर बाद ये खबर आई कि तालिबान ने तब तक किसी शांति सम्मेलन में भाग ना लेने का फैसला किया है, जब तक अफगानिस्तान से सभी विदेशी सैनिकों की वापसी नहीं हो जाती।
विश्लेषकों के मुताबिक इस तरह तालिबान ने जो बाइडन प्रशासन की सैनिक वापसी की नई समयसीमा के साथ-साथ अमेरिका के कहने पर आयोजित होने वाली इंस्ताबुल कांफ्रेंस को भी ठुकरा दिया है।
ताजा एलान के मुताबिक तुर्की के शहर इंस्ताबुल में अफगानिस्तान में अगली व्यवस्था को लेकर सहमति बनाने के मकसद से सम्मेलन का आयोजन अगले 24 अप्रैल से होगा। तुर्की और कतर उसके सह-आयोजक होंगे। सम्मेलन में मौजूदा अफगान सरकार और तालिबान को आमंत्रित किया जाएगा। तुर्की की ओर से जारी बयान के मुताबिक इससे सभी संबंधित पक्षों को अफगानिस्तान की जनता के लिए शांति, स्थिरता और समृद्धि का रास्ता ढूंढने के लिए अपना समर्थन जताने का मौका मिलेगा।
संयुक्त राष्ट्र ने मंगलवार को एक बयान में बताया कि इस्तांबुल सम्मेलन 24 अप्रैल से चार मई तक चलेगा। इसका मकसद तालिबान और अफगानिस्तान सरकार में न्यायपूर्ण और टिकाऊ राजनीतिक समाधान के लिए सहमति बनानी होगी। लेकिन अब साफ है कि तालिबान इस सम्मेलन का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है। इससे इस सम्मेलन की पूरी प्रासंगिकता की संदिग्ध हो जाने का खतरा है। बताया जाता है कि तालिबान इस बात से खफा है कि अमेरिका एक मई तक अपने सभी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाने के अपने वादे से मुकर गया है।
दरअसल, बाइडन प्रशासन के ताजा फैसले से यहां उत्साह इसलिए भी पैदा नहीं हुआ है कि इसका मतलब यहां नाटो फौजियों की वापसी को टालना समझा गया है। उधर यहां अमेरिका जताई जा रही ये राय भी चर्चित है कि अमेरिका अपनी फौज वापसी के बाद भी अफगानिस्तान में अपनी खुफिया और कूटनीतिक मौजूदगी बनाए रखनी चाहिए। उधर रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता सैनिक वापसी का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
उनमें पूर्व उप राष्ट्रपति डिक चेनी के बेटी लिज चेनी भी हैं, जो इस समय हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव की सदस्य हैं। 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले और वहां नाटो सेना की तैनाती के मुख्य सूत्रधार डिक चेनी ही थे। लिज चेनी ने कहा है कि सैनिक वापसी से ऐसा खतरनाक संदेश जाएगा जिसे या तो अमेरिका समझता नहीं है या वह जानबूझ कर उससे नावाकिफ बना हुआ है।
अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के नेता मिच मैकॉनेल ने सेना वापसी के फैसले को गंभीर भूल कहा है। उन्होंने कहा है कि इसका मतलब अभी भी मौजूद दुश्मन के सामने से भागना होगा। इसी पार्टी की सीनेटर लिंडसे ग्राहम कहा है कि सेना वापसी से अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट (आईएस), हिज्बुल्ला, चीन, रूस और ईरान को ये संदेश जाएगा कि अमेरिका कमजोर है। डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ नेताओं ने भी सैनिक वापसी के बाद वहां महिला अधिकारों की रक्षा का सवाल उठाया है।
इन आलोचनाओं का मतलब यहां यह समझा गया है कि अभी भी ये तय नहीं है कि अमेरिकी सेना सचमुच वापस जाएगी। न ही यह भरोसा है कि 11 सितंबर के पहले कोई ऐसा समाधान निकल आएगा, जिससे अफगानिस्तान में आम सहमति की सरकार बन जाए।