अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल खरीद पर प्रतिबंधों में दी गई छूट को आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे पश्चिम एशिया संकट के चलते संकट से गुजर रहे वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए और परेशानी बढ़ सकती है। व्हाइट हाउस में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा, 'हम रूसी तेल पर दी गई सामान्य लाइसेंस (छूट) को नवीनीकृत नहीं करेंगे और न ही ईरानी तेल पर दी गई छूट को बढ़ाएंगे।'
अमेरिकी वित्त मंत्री ने बताया केवल उन खेपों पर छूट थी, जो 11 मार्च से पहले समुद्र में थीं
स्कॉट बेसेंट ने साफ किया कि यह छूट केवल उन तेल खेपों पर लागू थी, जो 11 मार्च से पहले समुद्र में थीं और अब उनका उपयोग हो चुका है। गौरतलब है कि 5 मार्च को अमेरिका ने यूक्रेन युद्ध के चलते लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारत समेत कई अन्य देशों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दी थी। इस छूट की अवधि 11 अप्रैल को समाप्त हो गई। अब अमेरिका ने इस छूट की अवधि को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है।
अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव बनाने का किया एलान
इस बीच, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि यह कदम ईरान के खिलाफ वित्तीय बमबारी जैसा होगा और ईरान के खिलाफ आर्थिक मोर्चे पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बीते माह छूट का एलान करते हुए कहा कि अमेरिका के पास वैश्विक कीमतों को प्रभावित करने के कई विकल्प हैं और जरूरत पड़ने पर घरेलू भंडार का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
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भारत पर कैसे होगा असर?
भारत ने मार्च में छूट का फायदा उठाते हुए रूस से तेल आयात दोगुना कर दिया था। मार्च के महीने में ही रूसी तेल का आयात 21 लाख बैरल प्रति दिन तक जा पहुंचा है। अमेरिका की ओर से मिली छूट का भारत ने जमकर फायदा उठाया है। इससे पहले अक्टूबर, 2025 में अमेरिकी पाबंदी लगाने के बाद से भारत का रूस से तेल आयात बेहद गिर गया था। यह तेल आयात नवंबर, 2025 में 18.5 लाख बैरल रोजाना से गिरकर फरवरी, 2026 तक 10.6 लाख बैरल प्रतिदिन पर आ गया था। अब छूट वापस लिए जाने के बाद भारत पर भी इसका असर होना तय है।
चीन को भी चेतावनी
अमेरिका ने ईरान और चीन के बीच तेल व्यापार को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए संकेत दिया है कि वह इसमें शामिल संस्थानों पर कड़े कदम उठा सकता है। अमेरिकी वित्त मंत्री ने कहा, ईरान, दुनिया में आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले प्रमुख देशों में शामिल रहा है। चीन उसकी तेल आपूर्ति का 90 प्रतिशत से अधिक खरीद रहा था, जो चीन की कुल ऊर्जा जरूरतों का करीब 8 प्रतिशत हिस्सा है। अमेरिका का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी नाकेबंदी के चलते चीनी खरीद में अस्थायी ठहराव आ सकता है।
स्कॉट बेसेंट ने बताया कि इस संदर्भ में चीन के दो बैंकों को पत्र भेजे हैं। हालांकि, इन बैंकों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। अमेरिका ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि ये साबित होता है कि इन बैंकों के माध्यम से ईरानी धन का लेन-देन हो रहा है, तो उनके खिलाफ द्वितीयक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।