लेकिन अमेरिकी सरकार की ग्रीन ऊर्जा को अपनाने की योजना के तहत तेल और गैस उद्योग की भूमिका घटाने का इरादा जताया गया है। इसके लिए पवन चक्कियां लगाने और सोलर फार्म के निर्माण की योजना पेश की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल कुओं को खोदने, उनकी निगरानी और रखरखाव के दौरान कार्बन का काफी उत्सर्जन होता है। जबकि सोलर फार्म और पवन चक्कियों के निर्माण में ऐसा नहीं होता। साथ ही उनका रखरखाव भी आसान और कम खर्चीला होता है।
लेकिन पीडब्ल्यूसी ने कहा है कि इसका मतलब है कि तेल और गैस उद्योग के लिए अधिक लोगों की जरूरत होती है, जिससे ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक वर्ष (2019) में इस क्षेत्र में 1.4 ट्रिलियन डॉलर का पूंजी निर्माण हुआ। यह देश की सकल अर्थव्यवस्था का 7.9 फीसदी हिस्सा था।
अक्षय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने की समर्थक एजेंसी इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (इरना) ने 2016 में अपनी एक रिपोर्ट में माना था कि अक्षय ऊर्जा को अपनाने के क्रम में कम संख्या में रोजगार पैदा होंगे। उसने कहा था कि साल 2030 तक इस क्षेत्र में दुनियाभर में दो करोड़ 44 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। उसने कहा था कि 2016 की तुलना में अगर 2030 तक सभी देशों ने अक्षय ऊर्जा का हिस्सा दो गुना किया, तो उससे वैश्विक जीडीपी में 1.3 ट्रिलियन डॉलर का मूल्य जुड़ेगा। गौरतलब है कि सिर्फ अमेरिकी जीडीपी में इसका हिस्सा 1.6 ट्रिलियन डॉलर का है।
अपनी एक नई रिपोर्ट में इरना ने पिछले साल कहा था कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए जरूरी है कि दुनिया अक्षय ऊर्जा को अपनाए। अगर सभी देश ऊक्षय ऊर्जा को अपनाने के गंभीर कदम उठाएं, तो उससे दस करोड़ नई नौकरियां पैदा होंगी। लेकिन जानकारों का कहना है कि उस हाल में भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था नुकसान में रहेगी। ऐसे में जो बाइडन की ग्रीन एनर्जी अपनाने की महत्वाकांक्षा पूरी होगी, इसमें शक है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि बड़े आर्थिक स्वार्थ राष्ट्रपति की योजना के खिलाफ लामबंद होने लगे हैं। पीडब्ल्यूसी की ताजा रिपोर्ट उसकी दिशा में माहौल बनाने की एक कोशिश है।