सार
वॉशिंगटन के एक संघीय न्यायाधीश अमित मेहता ने ट्रंप प्रशासन को 800 मिलियन डॉलर के हिंसा रोकथाम फंड रद्द करने की अनुमति दी। मामले में पांच संगठनों ने फैसले पर रोक की मांग की थी। जिसके बाद कोर्ट ने कहा कि यह शर्मनाक तो है, लेकिन कानूनी दायरे से बाहर है।
एक संघीय न्यायाधीश ने ट्रंप प्रशासन को हिंसा रोकने और अपराध पीड़ितों की मदद के लिए चल रहे कार्यक्रमों के 800 मिलियन डॉलर (करीब ₹6,600 करोड़) के फंड को रद्द करने की अनुमति दे दी है। यह फैसला वॉशिंगटन डीसी के जिला न्यायाधीश अमित मेहता ने सोमवार को सुनाया। मामले में जज मेहता ने कहा कि सरकार का यह कदम शर्मनाक है और इससे अपराध और हिंसा से जूझ रहे समुदायों को नुकसान पहुंचेगा, लेकिन अदालत इसमें कुछ नहीं कर सकती क्योंकि यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
बता दें कि यह मामला तब शुरू हुआ जब पांच संगठनों ने 360 से अधिक ग्रांट प्राप्तकर्ताओं की ओर से एक अंतरिम रोक की मांग की थी। ये संगठन चाहते थे कि सरकार का ग्रांट रद्द करने का फैसला रोका जाए। लेकिन कोर्ट ने सरकार की मांग को मानते हुए मामला ही खारिज कर दिया।
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अदालत को मामले में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं- न्यायाधीश
न्याय विभाग ने कहा कि अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं है। यह केवल एक सामान्य अनुबंध विवाद है और इसे किसी अन्य अदालत में उठाया जाना चाहिए। फिलहाल, ट्रंप प्रशासन को इस मामले में राहत मिल गई है, लेकिन इसका सीधा असर उन सैकड़ों कार्यक्रमों और हजारों लोगों पर पड़ेगा जो इन फंड्स पर निर्भर थे। कम से कम 18 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी के अटॉर्नी जनरल, स्थानीय सरकारें और अभियोजक इस केस में इन संगठनों के समर्थन में सामने आए थे।
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इस वजह से रद्द हुए थे फंड
न्याय विभाग ने अप्रैल में यह फंड यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि उनकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अब वे सीधे तौर पर कानून व्यवस्था, मानव तस्करी और यौन उत्पीड़न के पीड़ितों को सहायता देने जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। कई संगठनों ने कहा कि इस अचानक की गई ग्रांट रद्दीकरण की वजह से उनके कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ी, कार्यक्रम बंद हुए और समुदाय के साथ बने रिश्ते टूटे।