अमेरिकी पुलिस का एक अफसर जिसने जॉर्ज फ्लॉयड (46) नाम के अश्वेत युवक की गर्दन अपने घुटने से 9 मिनट 29 सेकंड तक दबाकर उसे मार डाला, उसे अदालत ने दोषी ठहरा दिया है। इस घटना ने अमेरिका समेत पूरी दुनिया का विवेक हिला दिया और नस्ली न्याय के लिए लाखों लोग सड़कों पर उतर पड़े। इस जघन्य वारदात के लिए पूर्व अधिकारी डेरेक शॉविन को दोषी करार दे दिया गया है।
इस वारदात के लीक वीडियो में स्पष्ट सुना जा सकता है कि अफ्रीकी मूल के अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड ने 20 से ज्यादा बार पुलिस अफसर से कहा, ‘मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं’। 45 वर्षीय पुलिस अफसर शॉविन पर आरोप लगाया गया कि पिछले साल मई में मिनेपोलिस में उन्होंने एक निहत्थे और अश्वेत शख्स को गर्दन दबाकर मारा जिसके बाद अमेरिका समेत पूरी दुनिया में नस्लवाद और पुलिस दुर्व्यवहार पर विरोध प्रदर्शन हुए। यहां तक कि कई इतिहास पुरुषों की मूर्तियां भी उखाड़ फेंकी गईं। 12 सदस्यीय ज्यूरी ने तीन सप्ताह चली सुनवाई में शॉविन को तीन आरोपों के तहत दोषी करार दिया। ये मामले हत्या (मैन स्लॉटर), दूसरी डिग्री की हत्या और तीसरी डिग्री की हत्या के हैं। फैसले के बाद शॉविन की जमानत तुरंत रद्द कर दी गई और उन्हें हिरासत में ले लिया गया। अगले दो महीने में दोषी पुलिस अफसर को इन मामलों में सजा सुनाई जाएगी।
फैसला होने तक घर नहीं लौटे ज्यूरी सदस्य
ज्यूरी के 12 सदस्यों को यह तय करना था कि डेरेक शॉविन को जेल भेजा जाए या उन्हें बरी कर दिया जाए। सोमवार को दोनों पक्षों के अंतिम दलीलें रखने के बाद ज्यूरी को होटल में अलग-थलग कर दिया गया ताकि उनका बाहर से कोई संपर्क नहीं रहे और वे फैसले पर अच्छे से विचार-विमर्श कर सकें। ज्यूरी सदस्यों को फैसले पर एक राय बनाने को कहा गया। उनसे कहा गया कि वे तब तक घर नहीं लौट सकते जब तक कि वे अपना फैसला नहीं ले लेते।
नस्लवाद अमेरिका की आत्मा पर एक दाग है : बाइडन
अदालती फैसले के बाद राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा, फ्लॉयड को वापस तो नहीं लाया जा सकता है लेकिन अमेरिका में न्याय की दिशा में यह एक बड़ा कदम कहा जा सकता है। दिन-दहाड़े हुई इस हत्या ने पूरी दुनिया की आंखें खोल दीं ताकि वे देश में नस्लवाद की जड़ें देख सकें। बाइडन ने कहा, नस्लवाद हमारे देश की आत्मा पर एक दाग है। उन्होंने कहा, अश्वेत अमेरिकियों को जॉर्ज फ्लॉयड जैसा दर्द हर रोज सहना पड़ता है, इसलिए हम यहां रुकेंगे नहीं, हमें काफी कुछ करना है।
उन्होंने कहा- ये फैसला जॉर्ज को वापस तो नहीं ला सकता लेकिन इससे हमें पता चलेगा कि हम आगे क्या कर सकते हैं। उसके आखिरी शब्द थे, मैं सांस नहीं ले सकता। हम इन शब्दों को मरने नहीं दे सकते। हमें इन्हें सुनना होगा। हम इससे भाग नहीं सकते।
अश्वेतों को इनसान नहीं समझा गया : हैरिस
फैसले के तुरंत बाद राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने कहा कि पूरे इतिहास में अश्वेत अमेरिकियों को इनसान नहीं समझा गया। हम आज फैसले पर राहत महसूस कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वह पीड़ा कम नहीं की जा सकती जो जॉर्ज को मिली। उन्होंने कहा, न्याय का उपाय करना और समान न्याय में फर्क है, यह फैसला हमें एक कदम पास लाया है लेकिन अभी और काम करने की जरूरत है।
भारतवंशी सांसदों ने किया फैसले का स्वागत
फ्लॉयड की मौत के मामले में सुनाए गए फैसले का भारतीय-अमेरिकी सांसदों और समूहों ने स्वागत किया है। कांग्रेसी सांसद प्रमिला जयपाल ने कह, अश्वेतों की जिंदगी मायने रखती है और हमें इसके लिए लड़ते रहना होगा। सांसद रो खन्ना ने कहा, मेरा दिल फ्लॉयड के परिवार के साथ है और अब हमें जस्टिस इन पुलिसिंग एक्ट को पारित करना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’।
ज्यूरी को भेजा गया था मामला
अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के मामले में पूर्व पुलिस अधिकारी डेरेक चाउविन के खिलाफ हत्या का मामला सोमवार को ज्यूरी को भेज दिया गया था। पिछले साल चाउविन द्वारा अश्वेत नागरिक फ्लॉयड की गर्दन को घुटने से दबाये जाने के बाद दम घुंटने से उसकी मौत हो गई थी, जिसका वीडियो सामने आने के बाद अमेरिका में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे।
लोगों में फिर से नाराजगी उभरने के बाद इस मामले को जूरी को भेजने का फैसला लिया गया। ज्यूरी में छह श्वेत लोग और छह अश्वेत लोग शामिल थे। लगभग पूरे दिन बहस चली, जिसमें अभियोजन पक्ष का तर्क था कि पिछले साल मई में चाउविन ने फ्लॉयड के जीवन को इस तरह से छीन लिया कि एक बच्चा भी जानता है कि वह तरीका गलत था।
हालांकि, बचाव पक्ष ने दावा किया था कि सेवा से बर्खास्त किए जा चुके श्वेत अधिकारी ने उचित कार्रवाई की थी और 46 वर्षीय फ्लॉयड की हृदय संबंधी बीमारी और नशीली दवाओं के अवैध इस्तेमाल से मौत हुई थी।
बहस खत्म होने के बाद, न्यायाधीश पीटर काहिल ने कैलिफोर्निया के जन प्रतिनिधि मैक्सिकन वाटर्स की टिप्पणियों के आधार पर कथित गलत तरीके से मुकदमे को लेकर बचाव पक्ष के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया था कि अगर फैसले में किसी को दोषी नहीं ठहराया जाता है तो प्रदर्शनकारी अधिक उग्र हो सकते हैं।