सामरिक मामलों में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और चीन अपनी व्य़ापार वार्ता को गंभीरता से आगे बढ़ा रहे हैं। मंगलवार को दोनों देशों के अधिकारियों के बीच फिर बातचीत हुई। अक्तूबर में यह उनके बीच हुई दूसरी बातचीत है। दोनों पक्षों ने एक साझा बयान में कहा कि उन्होंने आर्थिक सूरत और द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सहयोग के मुद्दों पर ‘व्यावहारिक, खुली और रचनात्मक’ बातचीत की। पर्यवेक्षकों का कहना है कि ये वार्ता इस बात का संकेत है कि दोनों देश व्यापार के मामले में मौजूद आपसी समस्याओं का हल ढूंढने के इच्छुक हैं।
बातचीत के बारे में दोनों में से किसी देश ने विस्तृत विवरण नहीं दिया है। लेकिन जो बयान जारी हुआ, उससे यह संकेत जरूर मिला है कि बातचीत रचनात्मक दिशा में है। विश्लेषकों का कहना है कि एक महीने के भीतर दो बार हुई बातचीत इस बात का संकेत है कि दोनों देश व्यापार क्षेत्र में जारी तनाव घटाना चाहते हैं। बताया जाता है कि वार्ता के दौरान चीन ने अमेरिका में चीनी उत्पादों पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क और चीनी कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों का मामला उठाया।
चीनी पर्यवेक्षकों के बीच इस घटनाक्रम से उत्साह है। बीजिंग स्थित साइनोस्टील इकॉनमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट में चीफ रिसर्च फेलॉ हू चिमू ने चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स से कहा- ‘डोनाल्ड ट्रंप की चीन के प्रति अपनाई गई व्यापार नीति से अमेरिकी हितों को ही नुकसान पहुंचा। इसलिए यह जरूरी है कि बाइडन प्रशासन अपनी सोच में सुधार करे।’
चीनी विश्लेषकों ने उम्मीद जताई है कि अमेरिका वाणिज्य मंत्रालय जल्द ही कई चीनी उत्पादों पर से अतिरिक्त शुल्क हटा लेगा। बीजिंग स्थित चाइनीज एकेडेमी ऑफ सोशल साइंसेज से जुड़े विशेषज्ञ लिंगियून के मुताबिक मुमकिन है कि अमेरिका ये कदम परोक्ष रूप से उठा ले।
जेनट येलेन और लिउ की बातचीत के बाद जारी बयान के मुताबिक अमेरिका और चीन इस बात पर सहमत हैं कि विश्व अर्थव्यवस्था में सुधार इस वक्त नाजुक मोड़ पर है। इसलिए यह जरूरी है कि ये दोनों देश व्यापक आर्थिक नीतियों के मामले में आपसी संवाद को मजबूत करें और आपस में सहयोग बनाए रखेँ। पर्यवेक्षकों ने कहा है कि पिछली बार दोनों देशों ने साझा तौर पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल अगस्त 2020 में किया था। अब पेट्रोलियम की महंगाई, ऊर्जा संकट, और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन संबंधी दिक्कतों के बीच दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत महसूस की है।