संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप-27) यहां अगले हफ्ते शुरू होगा। उसके लिए तैयारियां जोरों पर हैँ। ये सम्मेलन उस समय हो रहा है, जब गुजरे महीनों में दुनिया के कई हिस्सों में जलवायु परिवर्तन के कारण भीषण विनाश देखने को मिला है। इस वर्ष पाकिस्तान में असाधारण बाढ़ आई, जबकि पूरे यूरोप को असामान्य गर्म हवाएं झेलना पड़ीं। अमेरिका में कई जोरदार तूफान आए। दुनिया के कई हिस्से इस समय सूखे का प्रभाव झेल रहे हैँ।
यहां पहुंच रहे एनजीओ कार्यकर्ताओं ने कहा है कि इतना भीषण विनाश देखने के बावजूद अगर सरकारों का रवैया लापरवाह रहा, तो इसे मानवता के प्रति अपराध ही माना जाएगा। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि जलवायु परिवर्तन की सबसे ज्यादा मार विकासशील देशों को झेलनी पड़ रही है, जबकि कार्बन उत्सर्जन में उनका हिस्सा बहुत कम रहा है।
एनजीओ वलनरेबल-20 ने इस वर्ष जून में जलवायु परिवर्तन के असर का अध्ययन शुरू किया था। 20 देशों के अध्ययन के बाद ये संस्था इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि इन देशों में बीते दो दशक में जलवायु परिवर्तन के कारण साझा तौर पर 525 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। यह रकम इन देशों के 2019 में रहे सकल घरेलू उत्पाद के 22 प्रतिशत के बराबर है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक कार्बन उत्सर्जन के कारण धरती का तापमान बढ़ गया है, जिसकी वजह से मौसम का पैटर्न बदल गया है। वलनरेबल-20 के मुताबिक जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा नुकसान बांग्लादेश को झेलना पड़ा है। दुनिया में कुल हुई क्षति का 44 प्रतिशत तीन देशों- बांग्लादेश, फिलीपीन्स, और वियतनाम में हुआ है। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम ने अपनी एक रिपोर्ट में निवासियों के हवाले से बताया है कि बांग्लादेश के दक्षिणी इलाकों में समुद्री खारा पानी घुस आने के कारण जमीन की उपजाऊ क्षमता घट गई है। इसलिए उस इलाके में अब रहना मुश्किल हो गया है।
बांग्लादेश के ये इलाके समुद्र में बढ़ रहे जल स्तर से प्रभावित हुए हैं। बांग्लादेश की सरकारी संस्था सॉयल रिसोर्स डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने 2009 में अपने अध्ययन के दौरान यह देखा था कि तटीय इलाकों में दस लाख वर्गकिलोमीटर इलाकों पर खारा पानी का खराब असर हो रहा है। उसके बाद के 13 वर्षों में ये समस्या और गहरी हो गई है।
विश्लेषकों के मुताबिक कॉप-27 में ऐसी तमाम उदाहरणों पर चर्चा होगी। इसके पहले कॉप-26 पिछले साल ब्रिटेन के ग्लासगो में हुआ था। वहां 130 से अधिक देशों ने एक प्रस्ताव रखा था, जिसमें विकासशील देशों को वित्तीय मदद देने की नई व्यवस्था की मांग की गई थी। इन देशों ने कहा था कि ये वित्तीय सहायता जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को रोकने के उपायों पर खर्च होगी। लेकिन अमेरिका सहित अन्य धनी देशों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। अब कार्यकर्ताओं की नजर इस पर है कि क्या कॉप-27 में इस मुद्दे पर मतभेद पाटने की दिशा में कोई प्रगति होती है।
विकासशील देशों के नेता इस बार वित्तीय मदद की मांग को पुरजोर ढंग उठाएंगे। पाकिस्तान की जलवायु परिवर्तन मंत्री शेरी रहमान ने कहा है- ‘अगले कॉप में हमारा क्या रुख होगा, इसको लेकर हमारी स्पष्ट राय है। जो देश सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं, उन्हें वित्तीय क्षति की भरपाई के लिए एक नई व्यवस्था बनानी ही होगी।’ पाकिस्तान में हाल में आई बाढ़ से लगभग 1,400 लोगों की जान गई थी। इसके अलावा अरबों डॉलर का नुकसान होने का अंदाजा वहां लगाया गया है।