पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ता जा रहा है। दुनियाभर में भीषण गर्मी का प्रकोप जारी है। कहीं बहुत ज्यादा गर्मी के कारण जंगलों में आग लग रही है तो कहीं लोगों को पानी की कमी से जूझना पड़ रहा है। भारत के भी कई राज्यों में गर्मी और उमस से लोग बेहाल हैं। अपने ठंडे मौसम के लिए पहचाने जाने वाले यूरोप और अमेरिका भी एतिहासिक गर्मी का सामना कर रहे हैं। इसी बीच, संयुक्त राष्ट्र ने एक डराने वाली चेतावनी जारी की है। उसके मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण करीब 50 करोड़ बच्चे हर साल अपने दादा-दादी की तुलना में दोगुने या उससे भी अधिक दिनों तक भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं।
असामान्य रूप से तापमान में हो रही बढ़ोतरी
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनिसेफ के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के भयंकर असर के कारण तापमान में असामान्य रूप से बढ़ोतरी हो रही है। इस बढ़ते हुए तापमान का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, पांच में से एक बच्चा ऐसे इलाकों में रहता है, जहां 60 साल पहले की तुलना में हर साल कम से कम दोगुने दिन गर्म दर्ज किए जाते हैं। इनकी तादाद करीब 46.6 करोड़ है।
बच्चों में जलवायु परिवर्तन...
यूनिसेफ के मुताबिक, अगर वैश्विक स्तर पर बात की जाए तो हर पांच में से एक बच्चा भीषण गर्मी से प्रभावित है। दरअसल, बच्चों में जलवायु परिवर्तन के साथ अपने शरीर के तापमान को ढालने की क्षमता कम होती है। यूनिसेफ की एडवोकेसी प्रमुख लिली कैप्रानी ने कहा कि छोटे बच्चों के शरीर वयस्कों की तरह नहीं होते हैं, उनमें अत्यधिक गर्मी से बहुत अधिक खतरा होता है। उन्होंने गर्भवती महिलाओं के लिए खतरों की भी चेतावनी दी।
आठ करोड़ बच्चे शिक्षा से वंचित
इसके अलावा, जब उच्च तापमान के कारण स्कूलों को बंद करना पड़ता है, तो बच्चे शिक्षा से वंचित हो जाते हैं - जिसने 2024 में अब तक कम से कम आठ करोड़ बच्चों को प्रभावित किया है।
यह है हीटवेव की वजह
विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन इस हीटवेव की मुख्य वजह है। वहीं ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (जीएचजी), जो कोयले, गैस और तेल जैसे जीवाश्म ईंधन को जलाने से होता है, वो हीट वेव को अधिक गर्म और खतरनाक बना रहा है। वैश्विक तापमान उबाल पर है। अनुमान है कि दक्षिण एशिया के इन देशों में हर साल कम से कम 83 दिन 35 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान रहता है।