ब्रिटेन में मर्डर प्रिडिक्शन टूल बनाने की तैयारी में सरकार।
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2004 में हॉलीवुड की एक फिल्म ने दुनियाभर में हलचल मचा दी थी। नाम था- माइनॉरिटी रिपोर्ट। फिल्म की कहानी बहुत आसान- भविष्य में पुलिसबल ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर सकते हैं, जो कुछ समय बाद किसी अपराध को अंजाम देने वाले हों। यानी अपराध के होने से पहले ही संभावित अपराधियों को रोक देने की क्षमता। फिल्म की पटकथा आसान जरूर लग सकती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इस तकनीक की कमियां सामने आने लगती हैं। अब कुछ ऐसी ही तकनीक के चर्चे ब्रिटेन में भी हो रहे हैं। यहां ब्रिटिश सरकार के एक गोपनीय कार्यक्रम की कुछ जानकारियां सामने आई हैं। इसके तहत पुलिस ऐसा प्रोग्राम तैयार कर रही है, जो कि भविष्य के संभावित अपराधियों का पता लगा सकेगा।
ब्रिटेन के इस प्रोजेक्ट को लेकर जहां टेक एक्सपर्ट्स ने चिंता जाहिर की है तो वहीं आम लोग इस बात को जानने के बाद और ज्यादा जानकारी चाहते हैं। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ब्रिटेन का यह 'मर्डर प्रिडिक्शन टूल' क्या है? यह काम कैसे करेगा? इसे लेकर क्या चिंताएं जाहिर की जा रही हैं? आइये जानते हैं...
क्या है मर्डर प्रिडिक्शन टूल, ये काम कैसे करेगा?
द गार्डियन अखबार के मुताबिक, ब्रिटेन के न्याय मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ जस्टिस) की तरफ से इजाजत मिलने के बाद ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री रहने के दौरान ही इस प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल गई थी। इसके तहत ब्रिटिश सरकार अकादमिक रिसर्चरों के सहयोग से एक पायलट प्रोग्राम शुरू कर चुकी है।
ब्रिटेन के न्याय मंत्रालय का मानना है कि इस तरह का प्रोजेक्ट भविष्य में सार्वजनिक सुरक्षा को मजबूत कर सकता है। मंत्रालय का कहना है कि मशीनी एल्गोरिदम अपराधियों के चरित्र की समीक्षा करेगी और उन व्यवहारों का पता लगाएगी, जिससे यह पता चलेगा कि हत्या का जोखिम कितना है। कुछ इसी तरह अपराध पीड़ितों के डाटा की समीक्षा भी की जाएगी। इसके बाद डाटा विज्ञान की मदद से जोखिम का विश्लेषण किया जाएगा। साथ ही इसके वैकल्पिक तरीकों का भी पता लगाया जाएगा।
प्रोजेक्ट की जानकारी रखने वाले एक शख्स ने बताया कि इस कार्यक्रम से गंभीर अपराधों के जोखिम के विश्लेषण में मदद मिलेगी। इस प्रोजेक्ट में लोगों के 2015 से पहले के आपराधिक रिकॉर्ड को भी जुटाया जाएगा।
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मर्डर प्रिडिक्शन टूल को लेकर क्यों चिंतित हैं विशेषज्ञ?
इस प्रोजेक्ट की जानकारी पहली बार स्टेटवॉच नाम की चैरिटी फाउंडेशन की 'फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन रिक्वेस्ट' (FIR) के जरिए आई। ब्रिटेन का यह सिस्टम काफी हद तक भारत के 'सूचना के अधिकार' (RTI) की तरह है।
स्टेटवॉच में रिसर्चर पद पर तैनात सोफिया लायल ने इस प्रोजेक्ट को सिहराने वाला करार दिया है। उन्होंने गार्डियन को बताया कि ब्रिटेन ने कुछ समय पहले ऐसा ही एक प्रोग्राम बनाया, जो कि संभावित अपराध को होने से पहले ही रोकने के लिए था। लेकिन इसमें कई मूलभूत दिक्कतें दर्ज हुईं। अब नया मॉडल, जो कि नस्लभेदी पुलिस और गृह मंत्रालय के डाटा का इस्तेमाल करता है, वह कानूनी प्रणाली को किनारे कर ढाचांगत तौर पर भेदभाव को बढ़ावा देगा।
उन्होंने कहा कि नया प्रोग्राम ऐसे लोगों को निशाना बनाएगा, जो कि कट्टरपंथी हैं या कम कमाई वाले समुदाय से आते हैं। एक कंप्यूटर आधारित टूल, जो लोगों की पहचान हिंसक अपराधियों के तौर पर करता हो, उसे बनाना बिल्कुल गलत है। इसके अलावा मानसिक स्वास्थ्य, लत या दिव्यांगता पर संवेदनशील डाटा लेना निजता का हनन है और डराने वाला है।
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