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कमला हैरिस की दक्षिण-पूर्व एशिया यात्रा से जाहिर हुईं अमेरिकी रणनीति की सीमाएं

Sat, 28 Aug 2021 03:27 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सिंगापुर

सार

पर्यवेक्षकों के मुताबिक अमेरिका के जो बाइडन प्रशासन ने उसकी एशिया-प्रशांत रणनीति में दक्षिण-पूर्वी देशों के महत्व को जताने का मौका कभी नहीं गंवाया है। लेकिन इस क्षेत्र में आम राय यही है कि अपनी बातों के अनुरूप उसने कोई ठोस पहल नहीं की है...
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कमला हैरिस - फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
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अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस की दक्षिण-पूर्व एशिया के दो देशों की यात्रा ने अमेरिकी रणनीति की सीमाएं स्पष्ट कर दी हैं। ये बात ब्रिटिश अखबार द गार्जियन के टीकाकार विन्सेंट नी ने कही है। उधर वेबसाइट एशिया टाइम्स में टीकाकार नील बोविन्स ने लिखा है कि हैरिस की यात्रा से यही सामने आया है कि इन इलाके के देशों के साथ अमेरिका के संबंध बनाने की कोशिशों में प्रतीकत्मकता अधिक है, जबकि इन देशों के सामने रखने के लिए अमेरिका के पास ठोस और सार्थक प्रस्ताव कम ही हैँ। हैरिस ने इस हफ्ते सिंगापुर और वियतनाम की यात्रा की।

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पर्यवेक्षकों के मुताबिक अमेरिका के जो बाइडन प्रशासन ने उसकी एशिया-प्रशांत रणनीति में दक्षिण-पूर्वी देशों के महत्व को जताने का मौका कभी नहीं गंवाया है। लेकिन इस क्षेत्र में आम राय यही है कि अपनी बातों के अनुरूप उसने कोई ठोस पहल नहीं की है।

अपनी यात्रा के दौरान हैरिस ने कई अहम घोषणाएं कीं। उनमें सिंगापुर के साथ साइबर सिक्योरिटी में सहयोग बढ़ाने से लेकर वियतनाम को कोविड-19 वैक्सीन की सहायता देना तक शामिल है। उन्होंने अमेरिका की रोग नियंत्रण और निवारण एजेंसी- सीडीसी के क्षेत्रीय कार्यालय का उद्घाटन वियतनाम के हनोई में किया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इन कदमों के जरिए अमेरिका ने संकेत देने की कोशिश की है कि वह इस क्षेत्र की जरूरत के मुताबिक मदद देने के लिए तैयार है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी में स्थित अमेरिकन अध्ययन केंद्र में विदेश नीति संबंधी विशेषज्ञ एशले टाउनशेन्ड ने कहा है कि अब तक इस क्षेत्र को मिली अमेरिकी मदद नगण्य ही है।
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टाउनशेन्ड ने द गार्जियन से कहा- ‘हैरिस ने अपनी यात्रा के दौरान सबसे बड़ा एलान यह किया कि अमेरिका 2023 में एपेक (एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग संगठन) की शिखर बैठक की मेजबानी करेगा। लेकिन उन्होंने ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप करार में अमेरिका की वापसी का कोई इरादा नहीं जताया, जबकि इस क्षेत्र की यही सबसे प्रमुख अपेक्षा थी। यह इस बात का संकेत है कि बाइडन प्रशासन इस क्षेत्र में निवेश करने को कितना कम इच्छुक है।’

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हैरिस ने अपनी यात्रा के दौरान चीन की बढ़ती ताकत को नियंत्रित करने पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। इस संबंध में वैश्विक व्यापार को प्रोत्साहित करने वाले संगठन हिनरिच फाउंडेशन के सीनियर रिसर्च फेलॉ स्टीफन ओलसन का कहना है कि अमेरिका और चीन दोनों आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन) को अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र के रूप में देखते हैं। उन्होंने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ऐसे में इस क्षेत्र के देश इस होड़ का फायदा उठाते हुए उन दोनों से बेहतर सौदेबाजी करने में लगे हुए हैं।

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता हंटर मार्स्टन ने राय जताई है कि अमेरिका ने काफी समय से दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ अपना संबंध मजबूत करने की योजना बनाई हुई है। लेकिन इस पर अमल करने में उसने काफी समय गंवाया है। जो बाइडन ने इस क्षेत्र के लिए अपने राजदूतों की नियुक्ति में काफी समय लगा दिया। इस क्षेत्र के किसी देश के नेता के साथ उन्होंने निजी संवाद कायम नहीं किया है।

मार्स्टन ने कहा- ‘बाइडेन प्रशासन मानता है कि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा का केंद्रीय इलाका यही क्षेत्र है। लेकिन उच्च स्तर पर यहां ध्यान केंद्रित करने या राष्ट्रपति बाइडन के बिना निजी यात्रा के यह शक बना रहेगा कि बाइडन प्रशासन जो कहता है, क्या उसके प्रति वह सचमुच वचनबद्ध है।’
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