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अमेरिका: डॉलर को मिल रहा है दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की मुसीबत का फायदा

Mon, 16 May 2022 04:16 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

इस समय दूसरे बड़े बाजारों में मुश्किलें अमेरिका से भी ज्यादा हैं। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से यूरोपीय अर्थव्यवस्था हिली हुई है। उधर चीन में कोविड-19 फैलने के कारण लगाए गए लॉकडाउन से आर्थिक गतिविधियां सुस्त बनी हुई हैं। शंघाई कॉम्पोजिट स्टॉक इंडेक्स इस साल 16 प्रतिशत गिर चुका है...
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फेडरल रिजर्व बैंक
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विस्तार
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अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आम तौर पर मुश्किलें बढ़ने के संकेत हैं। लेकिन उसी समय डॉलर की कीमत तेजी से चढ़ रही है। इसे अमेरिकी मुद्रा में दुनिया भर के निवेशकों में कायम भरोसे का संकेत माना गया है। यहां तक कि अमेरिकी शेयर सूचकांक डाउ में गिरावट या मुद्रास्फीति दर में रिकॉर्ड बढ़ोतरी का भी असर डॉलर की कीमत पर नहीं पड़ा है।

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वॉल स्ट्रीट जर्नल के डॉलर इंडेक्स में इस साल अब तक आठ फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है। चीन की मुद्रा युवान की तुलना में इसकी कीमत सात फीसदी बढ़ी है। इसमें से ज्यादातर वृद्धि पिछले एक महीने के दौरान ही हुई है। जापान की मुद्रा येन की तुलना में इस वर्ष डॉलर 12 फीसदी और स्विट्जरलैंड की मुद्रा फ्रैंक की तुलना में 10 फीसदी महंगा हो चुका है।

फेडरल रिजर्व काम हुआ आसान

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक डॉलर का भाव चढ़ने के महत्त्वपूर्ण आर्थिक परिणाम होंगे। मुद्रा महंगी होने पर किसी देश का आयात बिल घट जाता है। उससे देश के अंदर मुद्रास्फीति दर पर काबू पाने में मदद मिलती है। अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि डॉलर के दाम में हालिया वृद्धि से अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व का काम आसान हो जाएगा। अब उस पर ब्याज दरें बढ़ाने का पहले जैसा दबाव नहीं रह जाएगा।

डॉलर की कीमत बढ़ने के कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें सबसे अहम यह है कि अमेरिका में ब्याज दरें दूसरे धनी देशों की तुलना में काफी ज्यादा हैं। मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर क्रिस्टीन फॉर्ब्स ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा- ‘अभी अमेरिका के दस साल के ट्रैजरी बॉन्ड पर 2.9 फीसदी का लाभ मिल रहा है। जबकि जर्मनी में लाभ की ये दर 0.95 फीसदी, ब्रिटेन में 1.7 फीसदी और जापान में 0.2 फीसदी है। अमेरिका में ऊंचा लाभ मिलने की गारंटी के कारण निवेशक फेडरल रिजर्व में अपना पैसा लगाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।’

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विशेषज्ञों ने इस तरफ भी ध्यान खींचा है कि इस समय दूसरे बड़े बाजारों में मुश्किलें अमेरिका से भी ज्यादा हैं। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से यूरोपीय अर्थव्यवस्था हिली हुई है। उधर चीन में कोविड-19 फैलने के कारण लगाए गए लॉकडाउन से आर्थिक गतिविधियां सुस्त बनी हुई हैं। शंघाई कॉम्पोजिट स्टॉक इंडेक्स इस साल 16 प्रतिशत गिर चुका है। चीन के शेंझेन और हांगकांग के शेयर बाजारों में गिरावट शंघाई से भी ज्यादा है।

वृद्धि दर को लेकर घटा फासला

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अनुमान लगाया है कि इस साल चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछले साल की तुलना में आधी घट कर 4.4 फीसदी ही रह पाएगी। उधर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 3.7 फीसदी रहेगी। 1989 के बाद दोनों देशों की वृद्धि दर में इतना कम फासला कभी नहीं रहा है।

इऩ संकेतों ने निवेशकों को डॉलर में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया है। फेडरल रिजर्व इस वर्ष पर अब तक ब्याज दर में 0.75 फीसदी की वृद्धि कर चुका है। इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्श के मुताबिक बाजार पर इसका असर असल वृद्धि की तुलना में कई गुना ज्यादा हुआ है। फेडरल रिजर्व बैंक के पूर्व प्रमुख विलियम डुडुली के मुताबिक यह फेडरल रिजर्व के लिए खुशी की खबर है। उन्होंने कहा- ‘इसका यह मतलब नहीं है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दर बढ़ाना रोक देगा, लेकिन उस पर अब अति आक्रामक ढंग से ऐसा करने का दबाव नहीं रहेगा।’

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