अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आम तौर पर मुश्किलें बढ़ने के संकेत हैं। लेकिन उसी समय डॉलर की कीमत तेजी से चढ़ रही है। इसे अमेरिकी मुद्रा में दुनिया भर के निवेशकों में कायम भरोसे का संकेत माना गया है। यहां तक कि अमेरिकी शेयर सूचकांक डाउ में गिरावट या मुद्रास्फीति दर में रिकॉर्ड बढ़ोतरी का भी असर डॉलर की कीमत पर नहीं पड़ा है।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक डॉलर का भाव चढ़ने के महत्त्वपूर्ण आर्थिक परिणाम होंगे। मुद्रा महंगी होने पर किसी देश का आयात बिल घट जाता है। उससे देश के अंदर मुद्रास्फीति दर पर काबू पाने में मदद मिलती है। अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि डॉलर के दाम में हालिया वृद्धि से अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व का काम आसान हो जाएगा। अब उस पर ब्याज दरें बढ़ाने का पहले जैसा दबाव नहीं रह जाएगा।
डॉलर की कीमत बढ़ने के कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें सबसे अहम यह है कि अमेरिका में ब्याज दरें दूसरे धनी देशों की तुलना में काफी ज्यादा हैं। मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर क्रिस्टीन फॉर्ब्स ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा- ‘अभी अमेरिका के दस साल के ट्रैजरी बॉन्ड पर 2.9 फीसदी का लाभ मिल रहा है। जबकि जर्मनी में लाभ की ये दर 0.95 फीसदी, ब्रिटेन में 1.7 फीसदी और जापान में 0.2 फीसदी है। अमेरिका में ऊंचा लाभ मिलने की गारंटी के कारण निवेशक फेडरल रिजर्व में अपना पैसा लगाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।’
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अनुमान लगाया है कि इस साल चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछले साल की तुलना में आधी घट कर 4.4 फीसदी ही रह पाएगी। उधर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 3.7 फीसदी रहेगी। 1989 के बाद दोनों देशों की वृद्धि दर में इतना कम फासला कभी नहीं रहा है।
इऩ संकेतों ने निवेशकों को डॉलर में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया है। फेडरल रिजर्व इस वर्ष पर अब तक ब्याज दर में 0.75 फीसदी की वृद्धि कर चुका है। इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्श के मुताबिक बाजार पर इसका असर असल वृद्धि की तुलना में कई गुना ज्यादा हुआ है। फेडरल रिजर्व बैंक के पूर्व प्रमुख विलियम डुडुली के मुताबिक यह फेडरल रिजर्व के लिए खुशी की खबर है। उन्होंने कहा- ‘इसका यह मतलब नहीं है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दर बढ़ाना रोक देगा, लेकिन उस पर अब अति आक्रामक ढंग से ऐसा करने का दबाव नहीं रहेगा।’