अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी ने बीते छह जनवरी को कैपिटल हिल (संसद भवन) पर हुए हमले की जांच के लिए आयोग के गठन के प्रस्ताव को रोकने में जिस तरह अपनी पूरी ताकत झोंक दी, उससे अमेरिकी लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंताएं फिर जाग गई हैं। विश्लेषकों ने कहा है कि आज अमेरिका को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें देश की एक प्रमुख पार्टी लोकतंत्र को पटरी से उतारने पर आमादा दिखती है।
छह जनवरी की घटनाओं की जांच के लिए आयोग बनाने का प्रस्ताव कांग्रेस (संसद) के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव से पारित हो गया था, जहां डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत है। लेकिन सीनेट में इसे पास होने से रोकने के लिए रिपब्लिकन पार्टी ने राष्ट्रपति जो बाइडन के शासनकाल में पहली बार फिलिबस्टर नियम का इस्तेमाल किया। फिलिबस्टर लागू हो जाने के कारण प्रस्ताव के पक्ष में 60 सदस्यों का मतदान करना अनिवार्य हो गया। हालांकि रिपब्लिकन पार्टी के छह सदस्यों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, फिर भी ये प्रस्ताव गिर गया। इसके पक्ष में कुल 54 सदस्यों ने ही वोट डाले।
न्यूयॉर्कर मैग्जीन की टीकाकार सुजेन ग्लैसर ने उसके तुरंत बाद कहा- ‘अगर कोई देश अपने संसद भवन पर हुए हमले की जांच के बारे में आम सहमति नहीं बना सकता, तो उसका मतलब है कि वह सचमुच बहुत गहरे संकट में है।’ 2018 में आई मशहूर किताब ‘हाउ डेमोक्रेसीज डाइ’ के लेखकों में से एक डैनियल जिबलैट ने इसी पत्रिका से कहा- ‘यह संभावना मौजूद थी कि डोनाल्ड ट्रंप की चुनावी हार के बावजूद देश में ध्रुवीकरण जारी रहेगा। उससे संकट पैदा होते रहेंगे। लेकिन असल में अब अमेरिका के अस्तित्व के लिए संकट उससे कहीं अधिक गहरा हो गया है, जिसकी भविष्यवाणी हमने अपनी किताब में की थी।’
इस मुद्दे पर रिपब्लिकन पार्टी के लगभग एकजुट हो जाने को पार्टी पर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कायम प्रभाव की मिसाल माना गया है। जानकारों ने कहा है कि सोशल मीडिया के जरिए फैलाई जा रही फेक न्यूज का असर रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों में बढ़ता ही जा रहा है। इसकी मिसाल शुक्रवार को मिली, जब जारी हुए एक नए जनमत सर्वेक्षण से सामने आया कि रिपब्लिकन समर्थकों के बहुमत की राय यह है कि छह जनवरी को कैपिटल हिल पर हमला ट्रंप के समर्थकों ने नहीं, बल्कि वामपंथी चरमपंथियों ने हमला किया था। यू-गोव-याहू सर्वे से सामने आया कि इस मामले में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक समर्थकों की राय पूरी तरह उलट है। 80 फीसदी डेमोक्रेटिक समर्थकों ने राय जताई कि हमला ट्रंप समर्थकों ने किया। जबकि 70 फीसदी से ज्यादा रिपब्लिकन समर्थकों ने कहा कि हमला वामपंथियों ने ट्रंप को बदनाम करने के लिए किया था।
विश्लेषकों का कहना है कि रिपब्लिकन पार्टी का एजेंडा पूरी तरह ऐसी ही सोच से गाइड हो रहा है। उसके नेता समर्थकों की राय और उनमें ट्रंप की जारी लोकप्रियता के खिलाफ जाने का साहस नहीं जुटा रहे हैं। इसलिए वे वैसी बातों का भी समर्थन कर रहे हैं, जो मुमकिन है कि उनके अपने विवेक भी खिलाफ हो।
इस घटना के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी में राष्ट्रपति जो बाइडन की सबको साथ लेकर चलने की नीति पर नए सिरे से मतभेद उभर आए हैं। पार्टी के प्रोग्रेसिव धड़े से जुड़े नेताओं ने कहा है कि राष्ट्रपति फिलिबस्टर नियम को खत्म करने पर राजी नहीं हैं, जबकि अब ये साफ है कि इस नियम के रहते वे अपना कोई एजेंडा लागू नहीं कर सकते। डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने कहा- ‘अगर रिपब्लिकन सीनेटर कैपिटल हिल पर सशस्त्र हमले की स्वतंत्र आयोग से जांच को सिर्फ इसलिए रोक सकते हैं कि उनके चरमपंथी समर्थकों के नाराज होने से उनकी चुनावी संभावनाओं पर असर पड़ेगा, तो फिर साफ है कि सीनेट के साथ कुछ गलत है। लोकतंत्र को बचाने के लिए हमें फिलिबस्टर को खत्म करना होगा।’
उधर 60 प्रोग्रेसिव संगठनों ने एक साझा बयान जारी कर कहा कि बिना फिलिबस्टर नियम में सुधार किए विद्रोह की एक घटना के लिए जांच आयोग भी नहीं बनाया जा सका, तो हमारे सामने दो ही विकल्प हैः या तो फिलिबस्टर की रक्षा की होगी या फिर लोकतंत्र की। प्रोग्रेसिव संगठन बैटल बोर्न कलेक्टिव के कार्यकर्ता एडम जेंटलसन ने कहा- अब एक ही सवाल रह गया है कि क्या डेमोक्रेटिक पार्टी लोकतंत्र को बचाने के कदम उठाएगी और फिलिबस्टर नियम को खत्म करेगी।