चीनी कांटे की संस्कृति को आसान भाषा में कह सकते हैं कि पुरुष सत्ता और उसके क्रूर इरादे का केंद्रीयकरण होना। एशिया के मध्य साम्राज्य पर सम्राट शी जिनपिंग का शासन है। यह जानना बेहद महत्वपूर्ण है कि अक्साई चीन इलाके को लेकर चीन हमेशा भारत के प्रति गुस्सैल क्यों रहा है। जहां 1961 में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि घास का एक तिनका तक नहीं उगता है।
आज भी भारतीय सेना साल 1962 वाली विरासत को अपने कंधों पर लिए चल रही है, जबकि 15 जून को सेना ने गलवां घाटी में एक जवान कर्नल संतोष बाबू को खोया था। भारतीय सरकार में विशेष रूप से दूरसंचार विभाग में चीनी पैठ थी। चीन क्यों अपने पड़ोसी देश के साथ 100 बिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान करना चाहेगा।
सच्चाई यह है कि भारत ने चुप्पी साधने का फैसला किया जबकि वो नेपाल, पाकिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, अफगानिस्तान और भूटान में चल रहे बीजिंग का षडयंत्र जानता था। इस सवाल का जवाब थोड़ा जटिल और सभ्यतात्मक है। आज भी चीन के सम्राट ईश्वर तरह खुद की पूजा करवाना पसंद करते हैं। जब चीन की नौसेना ने सेनकाकू द्वीप विवाद का हवाला देते हुए जापान के पानी में गश्त लगाई तो जापान ने जरा भी हड़बड़ाहट नहीं दिखाई।
वियतनाम भी उस समय चुप रहा जब उसकी नाव दक्षिण चीन सागर में डूब गई थी। एक सामयिक अपवाद को छोड़कर, पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्वी एशिया आर्थिक पावरहाउस प्रभावशाली शक्ति और इसके सर्वोपरि नेता का सम्मान करते हैं। हालांकि कुछ इसके विरोध में भी सुर उठाएंगे लेकिन वो बस उतना ही सीमित रहेगा।
यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग और जनरल झाओ जोगनी ने भी गलवां घाटी में पीएलए की गश्त के बाद भारत से यही उम्मीद लगाई है। शायद भारत साल 2017 में डोकलाम संकट के दौरान उठाए गए कदमों की तरह ही कोई फैसला लेता लेकिन तब कर्नल संतोष बाबू और उनके बिहारी साथियों ने सूर्य त्जू से लेकर चाणक्य, भारतीय शतरंज से चीन को बाहर करने तक सारा खेल बदल दिया था।
कर्नल संतोष बाबू ने चीन के सामने झुकने से मना कर दिया था और चीन को दिखाया कि वो भारत की पुरानी संस्कृति से जुड़े हुए हैं। कर्नल संतोष बाबू और उनके साथियों का मारा जाना देश के लिए किसी क्षति से कम नहीं है लेकिन इनकी मौत के बाद चीन के गुस्से के खिलाफ भारतीय सेना और जनता दोनों जाग उठे।
कर्नल बाबू का 15 जून को गलवां घाटी पर चीनी खून का गिराना एक गेम चेंजर की तरह था क्योंकि 1967 में नाथू ला के बाद पीएलए का कोई सैनिक मारा गया था। हालांकि गलवां घाटी में 17 चीनी सैनिका के मारे जाने का आंकड़ा है लेकिन जानकारों की माने तो ये आंकड़ा 56 भी हो सकता है। हालांकि चीन ने अभी तक मरने वालों की संख्या को लेकर कोई पुष्टि नहीं की है।
गलवां घाटी पर चीन के रवैये के बाद प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने जनता का मूड देखा और आर्थिक मोर्चे पर कई बड़े फैसले लिए। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी सीडीएस जनरल विपिन रावत और सेनाध्यक्ष जनरल मुकुंद नरावणे के साथ नीमू पहुंचे और सेना के जवानों का मनोबल बढ़ाया।
वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजील डोवाल और उनके प्रतिरूप वांग यी ने लद्दाख से सेना हटाने का फैसला किया। भारत ध्यान से स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और घाटी में शांति बनाने पर फोकस है। मध्य साम्राज्य में व्यावहारिक बदलाव के लिए भारत को अगले पांच साल सैन्य और आर्थिक निवारण बनाने की जरूरत है।