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नेपाल में भड़का विवादः ओली ने गुपचुप बदला देश का नाम, पार्टी में उठी विरोध की आवाजें

Sat, 07 Nov 2020 05:35 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू

सार

  • संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य नेपाल’ की जगह अब सिर्फ ‘नेपाल’ लिखने का आदेश
  • विपक्ष के साथ साथ पार्टी के भीतर ही उठने लगी विरोध की आवाज़
  • पार्टी नेताओं ने ओली पर देश की मौजूदा व्यवस्था पूरी तरह बदलने का लगाया आरोप
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Nepal PM KP Sharma Oli - फोटो : Social Media
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विस्तार
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नेपाल में अब देश के संवैधानिक नाम को लेकर खड़ा हुआ विवाद अब और तीखा हो गया है। कुछ दिन पहले देश के कानून, न्याय एवं संसदीय मामलों के मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी कर सभी सरकारी एजेंसियों से कहा था कि वे देश का नाम ‘संघीय लोकतांत्रिक नेपाल गणराज्य’ की जगह सिर्फ ‘नेपाल’ लिखें। केपी शर्मा ओली सरकार के इस कदम के पीछे क्या मंशा थी, इसे अब तक साफ नहीं किया गया है। लेकिन अब सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर इसको लेकर कड़े सवाल उठाए जाने लगे हैं। संविधान विशेषज्ञों का भी कहना है कि देश का आधिकारिक नाम महज इस तरह के सर्कुलर या कैबिनेट के फैसले से नहीं बदला जा सकता।     

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ओली सरकार के हालिया कदम का असर होगा कि दूसरे देश भी अपने दस्तावेजों में इस देश का नाम सिर्फ नेपाल लिखेंगे। इसी तरह देश की पाठ्यपुस्तकों में भी नाम बदलना पड़ेगा। जबकि नेपाल के संविधान की धारा 56 (1) में ये साफ लिखा है कि नेपाल संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य का मुख्य ढांचा तीन स्तरों वाला होगा। ये स्तर हैं- संघीय, प्रादेशिक और स्थानीय। इसी ढांचे के अनुरूप देश का आधिकारिक नाम संविधान में तय किया गया था।  

अब सत्ताधारी दल के भीतर इस मुद्दे को सीधे प्रधानमंत्री ओली और उनकी सरकार पर निशाना साधा जा रहा है। पार्टी की स्थायी समिति के सदस्य लीलामणि पोखरेल ने एक बयान में कहा है कि प्रधानमंत्री ओली लगातार ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिनका मकसद मौजूद व्यवस्था को ध्वस्त करना है। कम्युनिस्ट पार्टी की ही सांसद राम कुमारी झंकरी ने इसे संघीय व्यवस्था को कमजोर करने वाला कदम करार दिया है। 
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ये इल्जाम भी लगा है कि हालांकि ओली सरकार ने ये फैसला सितंबर में ही ले लिया था, लेकिन इसकी जानकारी प्रेस कांफ्रेंस के जरिए नहीं दी गई, जैसाकि आम चलन है। जब सर्कुलर जारी किया गया तो उसके बाद धीरे-धीरे ये जानकारी सार्वजनिक दायरे में आई। जब उस बारे में सवाल पूछा गया तब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि कैबिनेट ने ये निर्णय सितंबर ही ले लिया था। जब ये फैसला लिया गया, तो उसके काफी समय बाद तक संचार और सूचना तकनीक के मंत्रालय की वेबसाइट पर इसका कोई उल्लेख नहीं था।

जबकि सरकार के तमाम फैसलों की इस पर तुरंत जानकारी दी जाती है। फैसले को छिपाए रखने के सरकार के रवैये पर भी सवाल उठाए गए हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेताओं ने मीडिया से कहा है कि गोपनीयता बरतने के सरकार के तरीके से सरकार की मंशा पर शक खड़ा होता है।

नेपाल के गणराज्यीय संविधान को सितंबर 2015 में लागू किया गया था। उसके पहले सात साल तक इसे बनाने की प्रक्रिया चली। उस दौरान संविधान सभा का दो बार चुनाव हुआ। गणराज्यीय संविधान बनाने की कोशिश 2005 में राजतंत्र के खात्मे के बाद शुरू हुई थी। संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि देश के नाम से संघीय गणराज्य शब्द हटाना संविधान की भावना पर सीधा प्रहार है।

उन्होंने ध्यान दिलाया है कि देश का नाम फेडरल डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ नेपाल होगा, यह पहली संविधान सभा ने 2008 में ही तय कर लिया था और तभी इसी नाम की सूचना संयुक्त राष्ट्र को दे दी गई थी।

प्रधानमंत्री ओली का हालिया आचरण कई मामलों में संदिग्ध रहा है। उन पर आरोप है कि वे सत्ताधारी पार्टी को तोड़ने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। इन्हीं के बीच देश के नाम को विवाद खड़ा करने के उनके रुख ने पहले से ही सुलग रहे माहौल को और भड़का दिया है। 

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