थाईलैंड के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों के बीच फ्राइड चिकन, खासकर KFC खाने को लेकर एक अजीब अंधविश्वास प्रचलित है। मान्यता है कि ड्यूटी के दौरान इसे खाने से गंभीर मरीजों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। हालांकि, 345 सर्जिकल शिफ्ट्स पर किए गए एक रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल में इस मान्यता का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला।
{{#eligible}}
सभी खबरें बिना रुकावट पढ़ने के लिए
अमर उजाला एप डाउनलोड करें
थाईलैंड के आधुनिक चिकित्सा तंत्र में एक बेहद अनोखा और गहरा अंधविश्वास जड़ें जमाए हुए है। वहां के सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर और नर्स अपनी ड्यूटी के दौरान फ्राइड चिकन (केएफसी) खाने से बुरी तरह डरते हैं। थाईलैंड के अधिकतर डॉक्टरों का मानना है कि अस्पताल परिसर में काम के दौरान फ्राइड चिकन खाने या मंगाने से अचानक गंभीर मरीजों की बाढ़ आ जाती है और आपातकालीन भागदौड़ असहनीय हो जाती है।
विज्ञापन
अंधविश्वास की वैज्ञानिक जांच के लिए किया प्रयोग
बैंकॉक के वाजिरा अस्पताल में कोलोरेक्टल सर्जन 35 वर्षीय डॉ. थनत ने अपनी मेडिकल छात्र जीवन से चले आ रहे इस अंधविश्वास का वैज्ञानिक परीक्षण करने का फैसला किया। पट्टालुंग अस्पताल में उन्होंने 345 सर्जिकल शिफ्ट्स पर एक रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल किया। इसमें डॉक्टरों के तीन समूह बनाए गए। पहले समूह ने केएफसी खाया, दूसरे ने स्थानीय ब्रांड ‘फाइव स्टार चिकन’ खाया और तीसरे समूह ने कुछ नहीं खाया। फिलाडेल्फिया के प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल एनल्स ऑफ सर्जरी ओपन में प्रकाशित इस अध्ययन में पाया गया कि केएफसी खाने से काम का बोझ या मरीजों की संख्या बढ़ने का कोई संबंध नहीं है। इसके बावजूद डॉ. थनत कहते हैं, मैं और 80 फीसदी चिकित्सक आज भी इस पर यकीन करते हैं। अगर ड्यूटी के दौरान कोई मेरे लिए केएफसी लाएगा, तो मैं उसे शिफ्ट खत्म होने के बाद ही खाऊंगा।
शुभ मुहूर्त देखकर करते हैं अनुबंध
चुलालोंगकोर्न यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर थीरानुच पुसकश्रीकित के अनुसार, थाईलैंड में अंधविश्वास आधुनिकता का विरोधी नहीं है, बल्कि उसके साथ सहजता से रहता है। यहां विज्ञान की डिग्री रखने वाले डॉक्टर भी शुभ मुहूर्त देखकर अनुबंध पर हस्ताक्षर करते हैं और ताबीज पहनते हैं।
विज्ञापन
1984 में हुई KFC के श्राप की शुरुआत
केएफसी थाईलैंड में 1984 में शुरू हुआ और इसके 1,300 से अधिक आउटलेट हैं। यह देर रात डिलीवरी देने वाला पहला ब्रांड था। माना जाता है कि ग्रामीण इलाकों में देर रात काम कर रहे किसी भूखे डॉक्टर ने केएफसी ऑर्डर किया होगा और ठीक उसी समय अस्पताल में हादसों के शिकार गंभीर मरीजों का सैलाब आ गया होगा। यहीं से इस अंधविश्वास की शुरुआत हुई।
तनाव और काम के दबाव से जुड़ा है अंधविश्वास
डॉक्टरों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह अंधविश्वास केवल थाईलैंड के सरकारी अस्पतालों तक सीमित है। निजी अस्पतालों में अधिक मरीज आने पर डॉक्टरों की कमाई बढ़ती है, इसलिए वे ज्यादा मरीज चाहते हैं। लेकिन ओवरवर्क और कम वेतन से जूझ रहे सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए यह अनिश्चित तनाव से निपटने और आपसी एकजुटता बनाए रखने का एक मनोवैज्ञानिक तरीका है। डॉ. थनत के शब्दों में, “केएफसी का श्राप वास्तव में हमारे भीतर के डर की अभिव्यक्ति है। हमें अपनी अत्यधिक भागदौड़ का दोष मढ़ने के लिए बस एक ‘बलि का बकरा’ चाहिए।”