सीमित विदेशी मुद्रा को कहां खर्च करें, इस बारे में श्रीलंका सरकार ने अर्थशास्त्रियों और कारोबारियों के सुझाव की अनदेखी कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के इस रुख का देशवासियों पर बहुत खराब असर पड़ रहा है। देश के कारोबारियों के संगठन सिलोन चैंबर ऑफ कॉमर्स और कुछ प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने मांग की थी कि सरकार मैच्योर हुए बॉन्ड्स के भुगतान को फिलहाल रोक दे और विदेशी मुद्रा को वह रोजमर्रा के लिए जरूरी चीजों के आयात पर खर्च करे। लेकिन राष्ट्रपति गोताबया राजपक्षे की सरकार ने कर्ज डिफॉल्ट करने का ये सुझाव नहीं माना।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस सुझाव पर सरकार ने कोई प्रतिक्रिया देने की जरूरत भी नहीं समझी। इसके पहले उसने फौरी उपायों के जरिए समस्या टालने की कोशिश की थी, जिससे कोई स्थायी लाभ नहीं हुआ। बीते महीने सरकार ने डॉलर लाने के लिए करेंसी स्वैप (मुद्राओं की अदला-बदली) का सहारा लिया। इससे उसे चीन से डेढ़ बिलियन डॉलर प्राप्त हुए। लेकिन उससे तात्कालिक राहत ही मिली।
जिन आयातकों पर असर पड़ा है, उनमें प्राकृतिक गैस के सप्लायर भी हैं। देश की दो प्रमुख गैस कंपनियों में से एक लॉगफ्स गैस ने कुछ दिन पहले ये साफ कहा था कि डॉलर की कमी के कारण वह गैस का आयात नहीं कर पा रही है। उधर खाद्य सामग्रियों की उत्पादक एक कंपनी के एक अधिकारी ने टीवी चैनल अल-जजीरा से कहा कि कच्चे माल का आयात ना कर पाने के कारण कंपनी को अपने उत्पादन को आधा करना पड़ा है। अधिकारी ने कहा कि देश में उवर्रकों की भारी कमी है। उसका असर फसलों पर पड़ा है। इस कारण किसान भी इस कंपनी को अनाज की सप्लाई नहीं कर पा रहे हैं।