फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Economic Meltdown In Sri lanka: श्रीलंका में क्यों आया ऐसा भीषण आर्थिक संकट, इसमें चीन की भूमिका क्या?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Fri, 25 Mar 2022 07:44 PM IST

सार

श्रीलंका के दो प्रमुख समाचार पत्र कागज की कमी के कारण अपना प्रिंट एडिशन बंद कर रहे हैं। श्रीलंका के 30 लाख स्कूलों में छात्रों की परीक्षाएं अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई है क्योंकि अधिकारियों के पास परीक्षा लेने के लिए पर्याप्त कागज और स्याही नहीं है।
 
विज्ञापन
विज्ञापन
Economic Meltdown In Sri lanka - फोटो : Social Media
2.2 करोड़ की आबादी वाला छोटा दक्षिण एशियाई देश और हमारा पड़ोसी श्रीलंका 1948 में ब्रिटेन से आजादी के बाद सबसे खराब आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है। खाने-पीने की चीजें जैसे चावल, चीनी और मिल्क पाउडर तक के दाम कई गुणा बढ़ रहे हैं और लोग इसे पाने के लिए भारी कीमत चुका रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीनी 290 रूपये किलो और चावल 500 रूपये किलो बिक रहा है। श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा की भारी कमी है। इसी वजह से सरकार के पास जरूरी वस्तुओं को खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। पेट्रोल के दाम 50 रुपए और डीजल के दाम 75 रुपए तक बढ़ चुके हैं। 


वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि महामारी की शुरुआत से पांच लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं। रोजगार न होने के कारण मजबूरी में लोगों को देश भी छोड़ना पड़ रहा है।

देश के विदेशी मुद्रा संकट के बीच पेट्रोलियम की कीमतें आसमान छू गई हैं। कुछ दिनों पहले श्रीलंका से ऐसी तस्वीरे आईं कि लोग पेट्रोल खरीदने के लिए पेट्रोल पंप पर टूट पड़े हैं और लोगों को नियंत्रित करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। हजारों लोग घंटों तक कतार में इंतजार करके तेल खरीद रहे हैं। 

पुलिस ने कहा कि बीते शनिवार को पेट्रोल खरीदने के लिए कतार में खड़े तीन बुजुर्गों की मौत हो गई है। देश में डॉलर की कमी ने सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। फरवरी में रिकॉर्ड 17.5 प्रतिशत मुद्रास्फीति के साथ कीमतें आसमान छू रही हैं।
विज्ञापन

Economic Meltdown In Sri lanka - फोटो : Social Media
2.2 करोड़ की आबादी वाला छोटा दक्षिण एशियाई देश और हमारा पड़ोसी श्रीलंका 1948 में ब्रिटेन से आजादी के बाद सबसे खराब आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है। खाने-पीने की चीजें जैसे चावल, चीनी और मिल्क पाउडर तक के दाम कई गुणा बढ़ रहे हैं और लोग इसे पाने के लिए भारी कीमत चुका रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीनी 290 रूपये किलो और चावल 500 रूपये किलो बिक रहा है। श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा की भारी कमी है। इसी वजह से सरकार के पास जरूरी वस्तुओं को खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। पेट्रोल के दाम 50 रुपए और डीजल के दाम 75 रुपए तक बढ़ चुके हैं। 

वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि महामारी की शुरुआत से पांच लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं। रोजगार न होने के कारण मजबूरी में लोगों को देश भी छोड़ना पड़ रहा है।

देश के विदेशी मुद्रा संकट के बीच पेट्रोलियम की कीमतें आसमान छू गई हैं। कुछ दिनों पहले श्रीलंका से ऐसी तस्वीरे आईं कि लोग पेट्रोल खरीदने के लिए पेट्रोल पंप पर टूट पड़े हैं और लोगों को नियंत्रित करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। हजारों लोग घंटों तक कतार में इंतजार करके तेल खरीद रहे हैं। 

पुलिस ने कहा कि बीते शनिवार को पेट्रोल खरीदने के लिए कतार में खड़े तीन बुजुर्गों की मौत हो गई है। देश में डॉलर की कमी ने सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। फरवरी में रिकॉर्ड 17.5 प्रतिशत मुद्रास्फीति के साथ कीमतें आसमान छू रही हैं।

श्रीलंका में खाद्ध संकट गहराया। - फोटो : सोशल मीडिया
एक न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक श्रीलंका अपने इतिहास के सबसे खराब वित्तीय संकट का सामना कर रहा है। वहीं, एएनआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस-यूक्रेन युद्ध से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 14 साल के उच्च स्तर पर पहुंचने से श्रीलंकाई सरकार की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण गेहूं की कीमतों में भी भारी बढोतरी हो रही है। फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व 10 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश में पहले ही 'आर्थिक आपातकाल' की घोषणा कर चुके हैं, जिसमें सेना को खाद्यान्नों के वितरण के लिए विशेष अधिकार भी दिए गए हैं

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि लगभग दो सप्ताह तक कोलंबो बंदरगाह पर खड़े डीजल और विमानन ईंधन के कार्गो के भुगतान के लिए वे शुक्रवार तक किसी तरह 42 मिलियन डॉलर जुटाने में कामयाब रहे क्योंकि इसके लिए भुगतान करने के लिए डॉलर नहीं थे।

अखबार बंद, बच्चों की परीक्षा के लिए कागज नहीं
श्रीलंका के दो प्रमुख समाचार पत्र कागज की कमी के कारण अपने अखबार बंद कर रहे हैं। निजी स्वामित्व वाले उपाली समाचार पत्र ने कहा कि उनके अंग्रेजी भाषा का दैनिक द आइलैंड और उसका सिंहली संस्करण दीवैना, अखबारी कागज की कमी को देखते हुए केवल ऑनलाइन उपलब्ध होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि श्रीलंका के 30 लाख स्कूलों में छात्रों की परीक्षाएं अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई है क्योंकि अधिकारियों के पास परीक्षा लेने के लिए पर्याप्त कागज और स्याही नहीं है। इससे करीब 45 लाख विद्यार्थियों का भविष्य फिलहाल अधर में है। 

Gotabaya Rajapaksa - फोटो : Social Media
श्रीलंका की आर्थिक स्थिति इतनी गंभीर क्यों हो  गई है?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक श्रीलंका का यह खस्ताहाल चीन से कर्ज लेने की वजह से हुआ है।

श्रीलंका चीन के कर्ज के जाल में बुरी तरह फंसा हुआ है।

श्रीलंका ने चीन से कुल 5 बिलियन डॉलर का कर्ज लिया है। 2021 में भी चीन से 1 बिलियन डॉलर का और कर्ज लिया था।

इसके अलावा श्रीलंका भारत और जापान से भी कर्ज ले रखा है। देश को 7 खरब अमेरिकी डालर का कर्ज चुकाना है।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2021 तक श्रीलंका पर 35 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज था जिसमें चीन की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी थी।

अपन देश को कर्जदार बनाने के लिए मुख्त तौर पर श्रीलंका के राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे को जिम्मेदार माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि उन्होंने ही चीन से भारी कर्ज लिया।

श्रीलंका ने हम्बनटोटा पोर्ट को लगभग एक हजार करोड़ रुपए में 99 साल के लिए चीन को लीज पर दिया हुआ है।

कुछ साल पहले चीनी निवेश की मदद से हम्बनटोटा में एक बड़ी बंदरगाह परियोजना की शुरुआत की गई थी। लेकिन चीन के कर्ज की मदद से शुरू की गई अरबों डॉलर की यह परियोजना विवाद में फंस गई। परियोजना पूरी नहीं हो पा रही थी और श्रीलंका चीन के कर्ज तले दबता गया। 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग - फोटो : पीटीआई
2017 में एक समझौते के बाद श्रीलंका ने  99 साल की लीज पर इस बंदरगाह की 70 फीसदी की हिस्सेदारी चीन को दी तब जाकर चीन ने इसमें दोबारा निवेश शुरू किया।

चीन पर आरोप लगता रहा है कि उससे कर्ज लेने वाले देश जब इसे चुका नहीं पाते हैं तो वह उनकी संपत्तियों पर कब्जा कर लेता है। हालांकि चीन इस तरह के आरोपों को खारिज करता रहा है।

इस महीने की शुरुआत में, सरकार ने घोषणा की, कि वह अपने विदेश कर्जे के पुनर्गठन के लिए इंटरनेशनल मॉनेट्री फंड (आईएमएफ) से बेलआउट की मांग करेगी। अपना आर्थिक संकट दूर करने के श्रीलंका लिए भारत, चीन और अन्य देशों से और कर्ज मांग रहा है।

श्रीलंका को इस साल अपने विदेशी कर्ज को चुकाने के लिए करीब 7 अरब डॉलर की जरूरत है, जबकि देश का विदेशी भंडार 2.3 अरब डॉलर पर पहुंच गया है, जो नवंबर 2019 में मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के समय 7.5 अरब डॉलर से कम है।

श्रीलंका में विपक्ष के प्रमुख नेता और अर्थशास्त्री हर्षा डी सिल्वा ने इसी साल के शुरुआत में संसद सत्र के दौरान कहा था 2022 के फरवरी माह से लेकर अक्तूबर माह तक कितना भी चुकाए, लेकिन उसके बावजूद भी श्रीलंका पर चढ़ रहा विदेशी कर्ज उतर नहीं पाएगा।
 

Basil Rajapaksa called on PM Modi - फोटो : ANI
ऐसी नौबत कैसे आई?
दरअसल, पर्यटन श्रीलंका के लोगों की आय का बड़ा जरिया है। करीब पांच लाख श्रीलंकाई सीधे पर्यटन पर निर्भर हैं, जबकि 20 लाख अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े हुए हैं।

श्रीलंका की जीडीपी में टूरिज्म का 10 फीसदी  से ज्यादा योगदान है। टूरिज्म से सालाना करीब 5 अरब डॉलर यानी करीब 37 हजार करोड़ रुपए फॉरेन करेंसी श्रीलंका को मिलती है। 

पहले 2019 में हुए सीरियल बम ब्लास्ट और उसके बाद 2020 में कोरोना महामारी के कारण लगे प्रतिबंध के कारण श्रीलंका का पर्यटन सेक्टर बुरी तरह चरमरा गया और इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा।

राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को चीन से उम्मीद थी लेकिन उन्हें मायूसी हाथ लगी है। मजबूर श्रीलंका की नजरें अब भारत पर हैं। श्रीलंका अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में भारतीय कंपनियों से निवेश की आस लगाए बैठा है। 

इसी सिलसिले में पिछले सप्ताह भारत दौरे पर पहुंचे श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। श्रीलंका के उच्चायोग के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे को भरोसा दिया कि भारत हमेशा एक मित्र पड़ोसी के रूप में श्रीलंका के साथ खड़ा रहेगा। बासिल राजपक्षे ने मोदी को मुश्किल वक्त में श्रीलंका को दी गई मदद के लिए धन्यवाद दिया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next