कर्ज के बोझ तले दबे श्रीलंका के डिफॉल्ट करने (समय पर कर्ज चुकाने में अक्षमता जताने) के बाद अब उन निवेशकों में घबराहट का आलम है, जिन्होंने श्रीलंका सरकार के बॉन्ड खरीदे थे। अब उनकी नजर श्रीलंका सरकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के बीच अगले सोमवार से शुरू होने वाली बातचीत पर है। ये बातचीत वित्तीय सहायता के श्रीलंका के अनुरोध को लेकर होगी।
श्रीलंका ने सोमवार (18 अप्रैल) को अपना पहला डिफॉल्ट किया। उस रोज कर्ज पर ब्याज की जो रकम उसे चुकानी थी, उसने नहीं चुकाई। श्रीलंका के आर्थिक संकट को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय बाजार में श्रीलंका सरकार के बॉन्ड्स की कीमत पहले से ही गिर रही थी। जुलाई में मैच्योर होने वाले इंटरनेशनल सॉवरेन बॉन्ड (आईएसबी) आधी से कुछ ज्यादा कीमत पर बेचे जा रहे थे। 2023 में मैच्योर हो रहे बॉन्ड्स तो आधे से भी कम कीमत पर बेचे गए हैं। निवेशकों में ये धारणा गहरा गई है कि श्रीलंका सरकार बॉन्ड पर तय ब्याज के साथ पूरी रकम उन्हें चुका पाने में सक्षम नहीं रह गई है।
कोलंबो स्थित वित्तीय परामर्शदाता कंपनी जेबी सिक्युरिटीज के प्रबंधन निदेशक मुर्तजा जाफरी ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘बाजार मूल्य बेहद नीचे थे। निवेशकों को मालूम था कि श्रीलंका डिफॉल्ट करेगा।’
इन्हीं ताजा हालात में श्रीलंका सरकार को डिफॉल्ट करने का फैसला लेना पड़ा। लेकिन जानकारों का कहना है कि इस फैसले से आईएमएफ के साथ होने वाली बातचीत में नए पेच पड़ गए हैं। आईएमएफ पहले ही श्रीलंका सरकार को अपनी वो कसौटियां बता चुका है, जिन पर खरा उतरने के सख्त कदम उसे उठाने होंगे। आईएमएफ की राय है कि ये कदम उठाने पर ही श्रीलंका की अर्थव्यवस्था स्थिर होगी और वह कर्ज चुकाने के मामले में निवेशकों को आश्वस्त कर पाएगा।
जब तक श्रीलंका इन कसौटियों पर खरा नहीं उतरता, बॉन्डधारकों में बेचैनी फैली रहेगी। 2020 के अंत तक श्रीलंका पर 38.6 बिलियन डॉलर का विदेशी कर्ज था। इसमें बॉन्डधारकों का हिस्सा 14 बिलियन डॉलर था। जिन निवेशकों ने ये बॉन्ड खरीदे थे, वे आज इस अंदेशे में डूबे हुए हैं कि उनका यह निवेश डूब सकता है।