हर्षा डि सिल्वा का कहना है कि सिर्फ 17 किलोमीटर के हाईवे का संचालन करके कंपनी अपनी लागत निकाल लेगी ये संभव नहीं है, लेकिन कोलंबो यूनिवर्सिटी में सरकारी कर्ज और वित्त मामलों के अनुसंधानकर्ता उमेश मोरामुडाली ने कहा कि बिल्ड, ऑपरेट एंड ट्रांसफर (बॉट) का तरीका कर्ज लेकर परियोजनाओं के लिए खर्च जुटाने से बेहतर है। उनके मुताबिक, बॉट के तहत देश की सरकार को विदेशी निवेशकों को कोई कर्ज नहीं चुकाना पड़ता। इस तरह देश को विदेशी मुद्रा का नुकसान नहीं होता है।
लेकिन मोरामुडाली ने कहा, ''जब मैं कहता हूं कि बॉट देश के लिए अच्छा है, तो उसके साथ ही ये बात जुड़ी रहती है कि ऐसा पारदर्शी तरीके से निविदा प्रक्रिया के जरिए किया जाना चाहिए। फिर इस बात भी ख्याल रखना चाहिए कि परियोजना देश के फायदे में हो, उसे बनाने वाली कंपनी के फायदे में नहीं। यहां मुद्दा यह है कि इस बॉट परियोजना से देश में गहरा शक पैदा हुआ है।''
सीएचईसी की पहले से ही श्रीलंका में गहरी पैठ है। खासकर ये पैठ कोलंबो और हम्बनतोता में है। हम्बनतोता मौजूदा राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे और श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे का गृह शहर है। राजपक्षे के शासनकाल में श्रीलंका ने चीनी निवेश पर अपनी निर्भरता बढ़ाई है। सीएचईसी ने हम्बनतोता में बंदरगाह बनाने के अलावा मताला में हवाई अड्डा भी बनाया है। उसके बाद उसे ये नई परियोजना मिल गई है।
श्रीलंका में गैर सरकारी संस्था ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशन की उप कार्यकारी निदेशक सखिता गुनारत्ने ने वेबसाइट निक्कईएशिया से बातचीत में आशंका जताई कि बिना उचित निगरानी के हम्बनतोता शहर एक ऐसा क्षेत्र बन जा सकता है, जो श्रीलंका के कानून से बाहर होगा। वह अपराधियों के सुरक्षित अड्डे में तब्दील हो जा सकता है। लेकिन ऐसी तमाम आशंकाओं को दरकिनार कर राजपक्षे सरकार चीनी कंपनियों के प्रति मेहरबान बनी हुई है।