शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) ने नेपाल को डायलॉग पार्टनर का दर्जा दिया है। इसे नेपाल की बढ़ रही अंतरराष्ट्रीय पहचान का संकेत माना जा रहा है। लेकिन कई नेपाली राजनयिकों का मानना है कि नए समूह से संबंध मजबूत करते हुए अब कूटनीतिक दायरे में नेपाल को अधिक सावधानी से आगे बढ़ना होगा।
बीते हफ्ते उज्बेकिस्तान के समरकंद में हुई एससीओ की विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान नेपाल को डायलॉग पार्टनर का दर्जा देने का फैसला हुआ। आबादी, भूगोल और अर्थव्यवस्था के लिहाज से एससीओ संयुक्त राष्ट्र और निर्गुट आंदोलन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है। नेपाल ने 2016 में एससीओ से जुड़ने के लिए सहमति पत्र पर दस्तखत किए थे। उस समय कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के नेता केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री थे। अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान उन्होंने संबंधित सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए।
नेपाली राजनयिकों का कहना है कि किसी क्षेत्रीय संगठन में पर्यवेक्षक या डायलॉग पार्टनर देश की ज्यादा भूमिका नहीं होती। इसके बावजूद अगर नेपाल चाहे तो वह इस नए मौके का पूरा लाभ उठा सकता है। लेकिन इसके लिए गंभीरता से होमवर्क करना होगा। इन राजनयिकों ने ध्यान दिलाया है कि एससीओ से सैन्य और सुरक्षा संबंधी पहलू भी जुड़े हैं, इसलिए नेपाल को सावधानी से आगे बढ़ना होगा।
नेपाल ने जिस सहमति पत्र पर दस्तखत किए हैं, उसमें व्यापार, पारगमन, निवेश, ऊर्जा, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन के अलावा सुरक्षा के क्षेत्र में भी एससीओ से सहयोग बनाने का प्रावधान है। नेपाल के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- एससीओ राजनीति, सैनिक और सुरक्षा संबंधी मामलों में भी बात करने का मंच है। लेकिन नेपाल को आर्थिक क्षेत्र में लाभ मिल सकता है, क्योंकि भारत और चीन दोनों इस संगठन के सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि भारत और चीन दोनों के सदस्य होने से नेपाल के लिए उनकी खींचतान में फंसने की आशंका कम रहेगी। लेकिन अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में पेच पड़ सकता है।
बीते एक साल में ये धारणा मजबूत हुई है कि नेपाल के अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ संबंध मजबूत हो रहे हैं। इसको लेकर चीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा सरकार के प्रति अपनी नाखुशी भी जता चुका है। अब कयास लगाए जा रहे हैं कि नेपाल के एससीओ का डायलॉग पार्टनर बनने से इस सूरत पर कितना फर्क नहीं पड़ेगा।
विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा कि चीन की पहल पर बने एससीओ का डायलॉग पार्टनर बनने से पश्चिमी देशों से नेपाल के संबंध पर असर पड़ेगा, ऐसा सोचना गलत है। उन्होंने कहा- ‘भारत और चीन एससीओ के सदस्य हैं। दोनों ने नेपाल को यह दर्जा दिलाने में मदद की है। इसलिए नेपाल को एससीओ से जुड़ने में हिचकना नहीं चाहिए। लेकिन हमें सैनिक और सुरक्षा मामलों में अवश्य सतर्क रहने की जरूरत है।’