जब सोवियत संघ अलग-अलग देशों में टूट गया, तो कई कारखाने ठीक उसी जगह पर रह गए जहां वे पहले से थे। सोवियत संघ के विघटन से पहले यूक्रेन में कई रक्षा निर्माण केंद्र थे, जो बाद में भी वहीं रह गए।
यूक्रेन में चल रहे युद्ध के दौरान कुछ दिनों पहले युद्ध की तस्वीरों में एक तस्वीर कीव में जोराया माशप्रोएक्ट प्लांट के ऊपर उठती आग की लपटें और एंटोनोव कारखाने के ऊपर और काले धुएं की भी थी। ये यूक्रेन के प्रतिष्ठित रक्षा प्रतिष्ठान माने जाते हैं और जो रूस से खरीदे गए सैन्य उपकरणों और प्रणालियों के लिए भारतीय सशस्त्र बलों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है।
विज्ञापन
रूस ने यूक्रेनी एयरोनॉटिक्स कंपनी एंटोनोव और जोराया माशप्रोएक्ट सहित यूक्रेनी रक्षा प्रतिष्ठानों पर हमले कर किए थे। माना जा रहा है कि रूस ने अगर यह हमले तेज कर दिए तो भारतीय वायुसेना और नौसेना के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है और भारत में सैन्य हार्डवेयर की सप्लाई में बड़ी परेशानी आ सकती है,
भारतीय वायु सेना एंटोनोव कंपनी के बनाए 100 से अधिक एएन-32 विमानों का संचालन करती है जो भारतीय वायु सेना के परिवहन की शक्ति बन गई है। रूसी सेना यूक्रेन में दुनिया के जिस सबसे बड़े विमान को नष्ट कर दिया, उसे एंटोनोव ने ही बनाया था।
विज्ञापन
वहीं जोराया माशप्रोएक्ट गैस टरबाइन बनाता है जिससे भारतीय नौसेना के 30 से अधिक जहाजों को ऊर्जा मिलती है। भारतीय नौसेना गैस टरबाइन इंजन के लिए यूक्रेन पर बहुत ज्यादा निर्भर है।
जानबूझ कर यूक्रेन के रक्षा उद्योगों को निशाना बना रहा रूस
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि रूस जानबूझकर यूक्रेन के रक्षा उद्योग को निशाना बना रहे है, ताकि उसकी सप्लाई चेन गड़बड़ा जाए और वह घुटनों पर आ जाए।
दोनों कंपनियां भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना के लिए कलपुर्जों की आपूर्ति करती हैं। नौसेना लगभग छह से आठ रिजर्व टरबाइन रखती है। हालांकि हमेशा उपकरणों के तत्काल रखरखाव और मरम्मत के लिए स्पेयर पार्ट्स और अन्य सिस्टम का स्टॉक भी रखा जाता है, लेकिन यदि जोराया माशप्रोएक्ट प्लांट और एंटोनोव कारखाने पर हमले और तेज हुए तो भविष्य में यूक्रेन से उनकी आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, क्योंकि भारत सशस्त्र बलों के इस्तेमाल में आने वाली तमाम रूसी प्रणालियों के कई कल-पुर्जे यूक्रेन से ही खरीदता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध
- फोटो : Social media
दूसरी तरफ यूक्रेन को भी इस मामले में बड़ा झटका लग सकता है क्योंकि वह भारत के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत करना चाहता था। लेकिन इस जंग ने फिलहाल उसकी योजनाओं पर विराम लगा दिया है।
विशेषज्ञ क्या सोचते हैं?
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (सेवानिवृत्त) ने इस हालात पर 14 मार्च को अपने ट्वीट में कहा कि ‘भारतीय नौसेना की यूक्रेनी समुद्री गैस टरबाइनों पर बड़ी निर्भरता को देखते हुए गंभीरता से यह विचार करने का उपयुक्त समय है कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल)/जोरया माशप्रोएक्ट इसे संयुक्त उद्यम के तहत भारत में बनाएं।’
भारत यूक्रेन से क्यों खरीदता है सैन्य कलपुर्जे?
जब सोवियत संघ अलग-अलग देशों में टूट गया, तो कई कारखाने ठीक उसी जगह पर रह गए जहां वे पहले से थे। सोवियत संघ के विघटन से पहले यूक्रेन में कई रक्षा निर्माण केंद्र थे, जो बाद में भी वहीं रह गए। यूक्रेन सोवियत हथियार आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख निर्माता और सैन्य विकास अनुसंधान में अग्रणी था। लेकिन दोनों देशों के बीच एक मुक्त आदान-प्रदान बना रहा। दोनों देश सैन्य उपकरण, विमान और हथियार जो अपने यहां बनाते वे दूसरे को भेजते थे।
भारतीय सेना कैसे प्रभावित हो सकती है?
यूक्रेन और रूसी वायु सेना के बाद भारत एएन-32 का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। लद्दाख गतिरोध के दौरान AN-32 का सबसे ज्यादा उपयोग किया गया था। जब से भारत ने एंटोनोव से विमान खरीदना शुरू किया है, कंपनी कई विमान अपग्रेड भी कर रही है। कई विमानों को मरम्मत के लिए भी निर्माता कंपनी के पास अभी वापस जाना है।
एंटोनोव कंपनी कानपुर में भारतीय वायुसेना के बेस रिपेयर सेंटर में बेड़े के आधुनिकीकरण में भी शामिल है। यहां तक की भारतीय सेना यूक्रेन के कुशल कर्मियों और उनकी विशेषज्ञता के लिए भी निर्भर है।
2014 में भी मुश्किल आई थी
2014 में भी भारत और यूक्रेन दोनों को ऐसी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। 2014 में जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था, उस समय भारत के एएन-32 में से 10 एंटोनोव संयंत्र में ही फंस गए थे और वायु सेना उन्हें वापस लाने में असमर्थ थी। आखिरकार उन विमानों को वापस लाने के लिए कूटनीति का सहारा लेना पड़ा। उस समय भारतीय वायुसेना के बेड़े में 110 AN-32 थे।
नौसेना की ज्यादा निर्भरता
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वायुसेना की यूक्रेनी फर्मों पर निर्भरता तो एएन-32 और कुछ मिसाइलों तक ही सीमित है, लेकिन नौसेना उस पर बहुत ज्यादा निर्भर है। माना जा रहा है कि अगर जोराया मैशप्रोएक्ट युद्ध से बुरी तरह प्रभावित होता है, तो इसका समुद्र में हमारे जहाजों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने वाला है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अभी नौसेना के चार जहाजों का निर्माण किया जा रहा है। दो जहाज का निर्माण रूस में किया जा रहा है और दो को गोवा शिपयार्ड में अपग्रेड किया जाना है।
नौसेना सभी गैस टरबाइन जहाजों में से अधिकांश यूक्रेनी गैस टरबाइन का उपयोग करती है। हालांकि भारत फिलहाल रूस में बनने वाले जहाजों को खरीद रहा है। लेकिन 2014 के बाद से यूक्रेन ने रूस को गैस टरबाइन इंजन बेचने से इनकार कर दिया। तब भारत ने यूक्रेन के साथ एक जटिल सौदा किया। जिन चार जहाजों का निर्माण रूस में अभी हो रहा है, उस बारे में यह जानकारी सामने नहीं आई है क्या रूसी शिपयार्ड पहले ही यूक्रेन से जहाजों के लिए इंजन खरीद चुका है या नहीं?